दे॒वं वो॑ अ॒द्य स॑वि॒तार॒मेषे॒ भगं॑ च॒ रत्नं॑ वि॒भज॑न्तमा॒योः। आ वां॑ नरा पुरुभुजा ववृत्यां दि॒वेदि॑वे चिदश्विना सखी॒यन् ॥१॥
devaṁ vo adya savitāram eṣe bhagaṁ ca ratnaṁ vibhajantam āyoḥ | ā vāṁ narā purubhujā vavṛtyāṁ dive-dive cid aśvinā sakhīyan ||
दे॒वम्। वः॒। अ॒द्य। स॒वि॒तार॑म्। आ। ई॒षे॒। भग॑म्। च॒। रत्न॑म्। वि॒ऽभज॑न्तम्। आ॒योः। आ। वा॒म्। न॒रा॒। पु॒रु॒ऽभु॒जाः। व॒वृ॒त्या॒म्। दि॒वेऽदि॑वे। चि॒त्। अ॒श्वि॒ना॒। स॒खि॒ऽयन् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पाँच ऋचावाले उनचासवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को चाहिये कि परोपकार ही करें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'सवितादेव, भग व अश्विनीदेवों' का आराधन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
मनुष्यैः परोपकार एव कर्त्तव्य इत्याह ॥
हे मनुष्या ! अहमद्य व आयोर्विभजन्तं देवं सवितारं रत्नं भगञ्चेषे। हे पुरुभुजा नरा अश्विना ! सखीयन्नहं चिद्दिवेदिवे वामा ववृत्याम् ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Men should always do good to others is narrated.
O men ! I desire a wealthy learned man who preaches proper division of the life (in the form of Ashramas), charming wealth and prosperity, and leading men of the king and many supporter subjects. They behave like a friend day in and day out. I solicit your presence and help.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात सूर्य व विद्वानाच्या गुणांचे वर्णन केल्याने या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
