वांछित मन्त्र चुनें
487 बार पढ़ा गया

सहि क्ष॒त्रस्य॑ मन॒सस्य॒ चित्ति॑भिरेवाव॒दस्य॑ यज॒तस्य॒ सध्रेः॑। अ॒व॒त्सा॒रस्य॑ स्पृणवाम॒ रण्व॑भिः॒ शवि॑ष्ठं॒ वाजं॑ वि॒दुषा॑ चि॒दर्ध्य॑म् ॥१०॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa hi kṣatrasya manasasya cittibhir evāvadasya yajatasya sadhreḥ | avatsārasya spṛṇavāma raṇvabhiḥ śaviṣṭhaṁ vājaṁ viduṣā cid ardhyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। हि। क्ष॒त्रस्य॑। म॒न॒सस्य॑। चित्ति॑ऽभिः। ए॒व॒ऽव॒दस्य॑। य॒ज॒तस्य॑। सध्रेः॑। अ॒व॒ऽत्सा॒रस्य॑। स्पृ॒ण॒वा॒म॒। रण्व॑ऽभिः। शवि॑ष्ठम्। वाज॑म्। वि॒दुषा॑। चि॒त्। अर्ध्य॑म् ॥१०॥

487 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:44» मन्त्र:10 | अष्टक:4» अध्याय:2» वर्ग:24» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:3» मन्त्र:10


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (चित्तिभिः) इकट्ठे करनेरूप क्रियाओं से जिस (एवावदस्य) एवावद अर्थात् प्राप्त गुणों को कहते हैं जिससे वा (यजतस्य) मिलते हैं जिससे वा जो (अवत्सारस्य) रक्षकों को प्राप्त होते और (मनसस्य) माना जाता और उस (सध्रेः) तुल्य स्थानवाले (क्षत्रस्य) राजकुल वा राज्य के सम्बन्ध की (स्पृणवाम) इच्छा करें तथा (विदुषा) विद्वान् से (चित्) भी (अर्ध्यम्) अर्द्ध में उत्पन्न की तथा (रण्वभिः) रमणीयों से (शविष्ठम्) अत्यन्त बलिष्ठ (वाजम्) विज्ञानवान् की हम इच्छा करें (स, हि) वही हम लोगों की इच्छा करे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य दिन-रात्रि राज्य की उन्नति करने की इच्छा करते हैं, वे महाराज होते हैं ॥१०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'क्षत्र-मनस-एवावद - यजत-सध्रि-अवत्सार'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह प्रभु (हि) = ही (विदुषा चित्) = ज्ञानी पुरुषों से भी (अर्ध्यम्) = अपने अन्दर समृद्ध करने योग्य (शविष्ठं वाजम्) = खूब क्रियाशील [शवतिर्गतिकर्मा] शक्ति को उपासक में [स्पृणोति=grant, bestow] भरता है। प्रभु उपासक को ज्ञानी व शक्ति सम्पन्न बनाता है। [२] हम सब इस प्रकार प्रभु उपासना के द्वारा (क्षत्रस्य) = क्षतों से त्राण करनेवाले रक्षणात्मक कार्यों में प्रवृत्त होनेवाले, (मनसस्य) = विचारशील, (एवावदस्य) = सदा सत्य बोलनेवाले, जैसी चीज है वैसा ही कहनेवाले, (यजतस्य) = यज्ञशील, (सधे:) = सब के साथ मिलकर चलनेवाले, (अवत्सारस्य) = सारभूत सोम शक्ति का रक्षण करनेवाले पुरुष के (रण्वभिः) = रमणीय (चित्तिभिः) = विचारों के साथ उस बल को [शविष्ठं वाजम्] (स्पृणवाम) = अपने में पूरित करें [पूरयाम सा०] । हम रमणीय विचारोंवाले व बलशाली बनकर 'क्षत्र, मनस, एवावद, यजत, सध्रि व अवत्सार' बनें। ऐसा बनना ही हमारे जीवन का लक्ष्य हो । यदि हम प्रभु स्तवन करते हुए ऐसा नहीं बनते, तो अवश्य हमारे स्तवन में कहीं न कहीं त्रुटि है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु स्तवन से शक्ति व ज्ञान को प्राप्त करके [क] सबका रक्षण करनेवाले हों, [ख] विचारशील हों, [ग] सत्य बोलें, [घ] यज्ञशील हों, [ङ] सब के साथ मिलकर चलें, [च] शक्ति का रक्षण करनेवाले बनें ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्याश्चित्तिभिर्यस्यैवावदस्य यजतस्याऽवत्सारस्य मनसस्य सध्रेः क्षत्रस्य सम्बन्धं स्पृणवाम विदुषा चिदर्ध्यं रण्वभिः शविष्ठं वाजं स्पृणवाम स ह्यस्मान् स्पृहेत् ॥१०॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) (हि) (क्षत्रस्य) राजकुलस्य राष्ट्रस्य वा (मनसस्य) यन्मन्यते तस्य (चित्तिभिः) चयनक्रियाभिः (एवावदस्य) एवान् प्राप्तान् गुणान् वदन्ति येन तस्य (यजतस्य) यजन्ति सङ्गच्छन्ते येन तस्य (सध्रेः) सहस्थानस्य (अवत्सारस्य) योऽवतो रक्षकान् सरति प्राप्नोति तस्य (स्पृणवाम) अभीच्छेम (रण्वभिः) रमणीयैः (शविष्ठम्) अतिशयेन बलिष्ठम् (वाजम्) विज्ञानवन्तम् (विदुषा) (चित्) (अर्ध्यम्) अर्द्धे भवम् ॥१०॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्या अहर्निशं राज्योन्नतिं चिकीर्षन्ति ते महाराजा जायन्ते ॥१०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - With our collective thoughts and intentions and with all our love and delight, we desire to have that ruler for the social order whose high strength and dynamism is respected by the wise and enlightened scholars, who is a strong disciplinarian and organiser, who commands intelligence and eloquence, who is a holy and cooperative man of yajna, sociable as a friend and who can preserve, protect, defend, promote and enlighten the people and the system. Only such a person deserves to be the ruler.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of enlightened are highlighted.

अन्वय:

O men ! let that royal family or State like us, whose relation we love and value intensely with the acts of collecting virtues (following on his footsteps. Ed.). Indeed he is endowed with virtues, is unifier, protector, thoughtful and living together among his subjects with love. Let us also love that man, because he is full of sublime knowledge and is very mighty, and ever to be supported with charming dealings.

भावार्थभाषाः - Those persons become great rulers who day and night desire the progress or advancement of the State.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे रात्रंदिवस राज्याच्या उन्नतीची इच्छा करतात ती महाराज (महत) असतात. ॥ १० ॥