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बृ॒हद्वयो॑ बृह॒ते तुभ्य॑मग्ने धिया॒जुरो॑ मिथु॒नासः॑ सचन्त। दे॒वोदे॑वः सु॒हवो॑ भूतु॒ मह्यं॒ मा नो॑ मा॒ता पृ॑थि॒वी दु॑र्म॒तौ धा॑त् ॥१५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bṛhad vayo bṛhate tubhyam agne dhiyājuro mithunāsaḥ sacanta | devo-devaḥ suhavo bhūtu mahyam mā no mātā pṛthivī durmatau dhāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बृ॒हत्। वयः॑। बृ॒ह॒ते। तुभ्य॑म्। अ॒ग्ने॒। धि॒या॒ऽजुरः॑। मि॒थु॒नासः॑। स॒च॒न्त॒। दे॒वःऽदे॑वः। सु॒ऽहवः॑। भू॒तु॒। मह्य॑म्। मा। नः॒। मा॒ता। पृ॒थि॒वी। दुः॒ऽम॒तौ। धा॒त् ॥१५॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:43» मन्त्र:15 | अष्टक:4» अध्याय:2» वर्ग:22» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:3» मन्त्र:15


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) विद्वन् ! जो (धियाजुरः) बुद्धि वा कर्म्म से प्राप्त हुई वृद्धावस्था जिनको ऐसे (मिथुनासः) स्त्रियों के सहित वर्त्तमान जन (बृहते) वृद्ध (तुभ्यम्) आपके लिये (बृहत्) बड़े (वयः) जीवन को (सचन्त) उत्तम प्रकार प्राप्त होते हैं और (सुहवः) उत्तम प्रकार प्रशंसा करने योग्य (देवोदेवः) विद्वान् विद्वान् (मह्यम्) मेरे लिये सुखकारी (भूतु) हो और (पृथिवी) भूमि के सदृश (माता) माता (नः) हम लोगों को (दुर्म्मतौ) दुष्ट बुद्धि में (मा) नहीं (धात्) धारण करे ॥१५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जो अवस्था और विद्या में वृद्ध आप लोगों को विद्याओं से सम्बन्धित करते हैं और माता के सदृश कृपा से रक्षा करते हैं, वे आप लोगों के पूज्य हों ॥१५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'धियाजुरः मिथुनासः सचन्त'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) अग्रणी प्रभो ! (धियाजुर:) = बुद्धिपूर्वक कर्मों के द्वारा आपका उपासन करनेवाले (मिथुनासः) = पति-पत्नी (बृहते तुभ्यम्) = सदा से बढ़े हुए आपकी प्राप्ति के लिये (बृहद वयः) = दीर्घ जीवन को अपने साथ (सचन्त) = समवेत करते हैं, अर्थात् सदा इस दीर्घ जीवन में बुद्धिपूर्वक कर्मों के द्वारा आपकी उपासना के लिये यत्नशील होते हैं। [२] इस प्रकार का जीवन बीतने पर (देवः देव:) = प्रत्येक देव (मह्यम्) = मेरे लिये (सुहवः) = सुगमता से पुकारने योग्य (भूतु) = हो । वस्तुतः माता-पिता का सुन्दर प्रभु परायण जीवन सन्तानों में सब सद्गुणों को जन्म देता ही है। यह (पृथिवी माता) = हमारे लिये माता के समान सब भोजनों को प्राप्त करानेवाली यह भूमि माता (नः) = हमें (दुर्मतौ मा धात) = दुर्बुद्धि में मत स्थापित करे। भूमि माता से प्राप्त होनेवाले वानस्पतिक पदार्थों का सेवन करता हुआ मैं सदा सद्बुद्धि से युक्त रहूँ, मेरे अन्दर औरों के विनाश की भावना पैदा ही न हो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- बुद्धिपूर्वक कर्म करते हुए माता पिता प्रभु के उपासक हों। ऐसा होने पर सन्तान दिव्यगुणोंवाले व सद्बुद्धि-सम्पन्न होंगे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे अग्ने ! ये धियाजुरो मिथुनासो बृहते तुभ्यं बृहद्वयः सचन्त सुहवो देवोदेवो मह्यं सुखकारी भूतु पृथिवीव माता नोऽस्मान् दुर्म्मतौ मा धात् ॥१५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहत्) महत् (वयः) जीवनम् (बृहते) वृद्धाय (तुभ्यम्) (अग्ने) विद्वन् (धियाजुरः) धिया प्रज्ञया कर्म्मणा वा प्राप्तजरावस्थाः (मिथुनासः) सपत्नीकाः (सचन्त) समवयन्ति (देवोदेवः) विद्वान् विद्वान् (सुहवः) सुष्ठुप्रशंसनीयः (भूतु) भवतु (मह्यम्) (मा) निषेधे (नः) अस्मान् (माता) जननी (पृथिवी) भूमिरिव (दुर्मतौ) दुष्टायां प्रज्ञायाम् (धात्) दध्यात् ॥१५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! ये वयोविद्यावृद्धा युष्मान् विद्याभिः सह सम्बध्नन्ति मातृवत् कृपया रक्षन्ति ते युष्माकं पूज्या भवन्तु ॥१५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - People senior in age and wide in experience, eminent in knowledge and intelligence, men and women together, offer homage to you, Agni, lord of light and great. May the lord Divine, light of all divinities, be kind and gracious to me, and may mother earth look at us with favour and never forsake us.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of duties and attributes of an enlightened continued.

अन्वय:

O learned person ! the couples who have attained old age with good intellect or action offer their great life for your benefit. Let every scholar admire me. Let not my mother who like the earth, ever keep me in bad intellect.

भावार्थभाषाः - O men! Let those persons who are old in age and knowledge and who unite you with various sciences and protect you like mother be venerable to you.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! जे वय व विद्यावृद्ध असलेले लोक तुमच्याशी विद्येने संबंधित असतात व मातेप्रमाणे कृपावंत बनून रक्षण करतात ते तुम्हाला पूज्य वाटावेत. ॥ १५ ॥