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तवो॒तिभिः॒ सच॑माना॒ अरि॑ष्टा॒ बृह॑स्पते म॒घवा॑नः सु॒वीराः॑। ये अ॑श्व॒दा उ॒त वा॒ सन्ति॑ गो॒दा ये व॑स्त्र॒दाः सु॒भगा॒स्तेषु॒ रायः॑ ॥८॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tavotibhiḥ sacamānā ariṣṭā bṛhaspate maghavānaḥ suvīrāḥ | ye aśvadā uta vā santi godā ye vastradāḥ subhagās teṣu rāyaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तव॑। ऊ॒तिऽभिः॑। सच॑मानाः। अरि॑ष्टाः। बृह॑स्पते। म॒घऽवा॑नः। सु॒ऽवीराः॑। ये। अ॒श्व॒ऽदाः। उ॒त। वा॒। सन्ति॑। गो॒ऽदाः। ये। व॒स्त्र॒ऽदाः। सु॒ऽभगाः॑। तेषु॑। रायः॑ ॥८॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:42» मन्त्र:8 | अष्टक:4» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:3 | मण्डल:5» अनुवाक:3» मन्त्र:8


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (बृहस्पते) बृहत् अर्थात् विद्या आदि उत्तम पदार्थों की रक्षा करनेवाले ! (ये) जो (तव) आपकी (ऊतिभिः) रक्षा आदिकों के साथ (अरिष्टाः) नहीं हिंसा किये गये (सचमानाः) सम्बन्ध करते हुए (मघवानः) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त (सुवीराः) उत्तम वीरजन (अश्वदाः) अग्नि आदि वा घोड़ों को देनेवाले (उत) भी (वा) वा (ये) जो (गोदाः) सुशिक्षित वाणी वा गौवों के देनेवाले (वस्त्रदाः) वस्त्रों के देनेवाले और (सुभगाः) सुन्दर ऐश्वर्य्य वा धन से युक्त (सन्ति) हैं (तेषु) उनमें (रायः) धन होते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो धार्मिक राजा से रक्षा किये गये प्रशंसित धनों से युक्त दाताजन हैं, वे ही यशस्वी होके धनाढ्य होते हैं ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दानशीलता व धन्यता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (बृहस्पते) = सब आकाशादि बड़े-बड़े लोकों के (स्वामिन्) = [बृहतां पतिः] प्रभो ! (तव ऊतिभिः) = आपके रक्षणों से (सचमाना:) = संगत हुए हुए पुरुष (अरिष्टा:) = रोगों व वासनाओं से हिंसित नहीं होते, (मघवान:) = [मघ, मख] ये यज्ञशील होते हैं, (सुवीराः) = उत्तम वीर होते हैं । [२] आपकी उपासना के परिणामस्वरूप ये जो पुरुष यज्ञशील बनकर (अश्वदा:) = अश्वों के देनेवाले होते हैं, (उत वा) = अथवा (गोदाः) = प्रशस्त गौवों को देनेवाले होते हैं, (ये) = जो (वस्त्रदाः) = वस्त्रों का दान करते हैं, (तेषु) = उन पुरुषों में (रायः) = ऐश्वर्य (सुभगाः) = उत्तम भाग्य का कारण बनते हैं। इन दानशील पुरुषों के जीवन धनों से धन्य बनते हैं। धन इनके सौभाग्य को बढ़ानेवाले होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशील बनकर अश्व, गो, वस्त्र दान कर सौभाग्यशाली बनें-

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे बृहस्पते ! ये तवोतिभिररिष्टाः सचमाना मघवानः सुवीरा अश्वदा उत वा ये गोदा वस्त्रदाः सुभगाः सन्ति तेषु रायो भवन्ति ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तव) (ऊतिभिः) रक्षादिभिः सह (सचमानाः) सम्बध्नन्तः (अरिष्टाः) अहिंसिताः (बृहस्पते) विद्याद्युत्तमपदार्थानां पालक (मघवानः) परमपूजितधनाः (सुवीराः) शोभनाश्च ते वीराश्च ते (ये) (अश्वदाः) अश्वानग्न्यादींस्तुरङ्गान् वा ददति (उत) अपि (वा) (सन्ति) (गोदाः) ये गाः सुशिक्षिता वाचो धेनुं ददति (ये) (वस्त्रदाः) ये वस्त्राणि ददति (सुभगाः) सुष्ठु भग ऐश्वर्य्यं धनं वा येषान्ते (तेषु) (रायः) धनानि ॥८॥
भावार्थभाषाः - ये धार्मिका राज्ञा रक्षिताः प्रशंसितधनयुक्ता दातारः सन्ति त एव यशस्विनो भूत्वा धनाढ्या जायन्ते ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Brhaspati, O lord of unbounded wealth of the universe, the people who are free from injury, enjoying wealth and power, brave and fearless, sharing the blessings of your protections, who are generous and honourable and give horses, cows and clothes in charity, all enjoy the good fortune of wealth and power and the grace of divinities.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of teachings of the entitled person is continued.

अन्वय:

O Brihaspati (Protector of knowledge and other good things) associated with your protection, men are not harmed by foes and become endowed with much honored wealth and good heroes. They are possessors of good and auspicious wealth, who are generous givers of Agni (electricity/or horses) of well--trained refined speeches or cows, and of clothes.

भावार्थभाषाः - The donors are only protected by a righteous king who are endowed with admirable wealth and thus become glorious and rich.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे धार्मिक राजाकडून रक्षित व प्रशंसनीय धनांनी युक्त दाता असतात तेच यशस्वी होऊन धनाढ्य बनतात. ॥ ८ ॥