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उ॒रौ दे॑वा अनिबा॒धे स्या॑म ॥१७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

urau devā anibādhe syāma ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒रौ। दे॒वाः॒। अ॒नि॒ऽबा॒धे। स्या॒म॒ ॥१७॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:42» मन्त्र:17 | अष्टक:4» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:7 | मण्डल:5» अनुवाक:3» मन्त्र:17


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (देवाः) विद्वान् जनो ! जैसे हम लोग (अनिबाधे) विघ्नरहित होने पर (उरौ) बहुत सुख करनेवाले कार्य्य में विद्वान् (स्याम) होवें, वैसे आप लोग करिये ॥१७॥
भावार्थभाषाः - अध्यापक विद्वान् जनों को चाहिये कि सम्पूर्ण विद्या के प्रतिबन्धकों का निवारण करके सम्पूर्ण जनों को विद्वान् करें ॥१७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विशाल अनिबाध जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (देवा:) = सृष्टि के सब देवो! गतमन्त्र के अनुसार हम सब देवों का स्तवन करते हुए (उरौ) = विशाल (अनिबाधे) = बाधारहित जीवनमार्ग में (स्याम) = हों। इस 'उरु अनिर्बाध' मार्ग पर आगे और आगे बढ़ते हुए हम लक्ष्य-स्थान पर पहुँचे। [२] 'वासनाओं की बाधा का न होना' ही उन्नति का मार्ग है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारा जीवन विशालता को लिये हुए हो, वासनाओं की बाधा से रहित हो ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे देवा ! यथा वयमनिबाध उरौ विद्वांसः स्याम तथा यूयं विधत्त ॥१७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उरौ) बहुसुखकरे (देवाः) विद्वांसः (अनिबाधे) निर्विघ्ने सति (स्याम) भवेम ॥१७॥
भावार्थभाषाः - अध्यापकैर्विद्वद्भिः सर्वान् विद्याप्रतिबन्धकान् निवार्य सर्वे विद्वांसः सम्पादनीयाः ॥१७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O divinities, saints and sages, may we ever prosper in the unbounded generosity of nature and of mother earth.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of duties of learned persons is dealt further.

अन्वय:

O enlightened persons ! create such environment for us so that we may become good scholars, living in a vast and joy-giving atmosphere-free from obstacles and troubles.

भावार्थभाषाः - May we ever enjoy, O enlightened persons great and uninterrupted facilities. It is the duty of the learned teachers to remove all the obstacles in the way of acquirement of knowledge and to make all good scholars.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - अध्यापक विद्वानांनी संपूर्ण विद्याप्राप्तीच्या अडचणीचे निवारण करून सर्व लोकांना विद्वान करावे. ॥ १७ ॥