वांछित मन्त्र चुनें
440 बार पढ़ा गया

प॒देप॑दे मे जरि॒मा नि धा॑यि॒ वरू॑त्री वा श॒क्रा या पा॒युभि॑श्च। सिष॑क्तु मा॒ता म॒ही र॒सा नः॒ स्मत्सू॒रिभि॑र्ऋजु॒हस्त॑ ऋजु॒वनिः॑ ॥१५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pade-pade me jarimā ni dhāyi varūtrī vā śakrā yā pāyubhiś ca | siṣaktu mātā mahī rasā naḥ smat sūribhir ṛjuhasta ṛjuvaniḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प॒देऽपदे॑। मे॒। ज॒रि॒मा। नि। धा॒यि॒। वरू॑त्री। वा॒। श॒क्रा। या। पा॒युऽभिः॑। च॒। सिस॑क्तु। मा॒ता। म॒ही। र॒सा। नः॒। स्मत्। सू॒रिऽभिः॑। ऋ॒जु॒ऽहस्ता॑। ऋ॒जु॒ऽवनिः॑ ॥१५॥

440 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:41» मन्त्र:15 | अष्टक:4» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:3» मन्त्र:15


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (सूरिभिः) विद्वानों और (पायुभिः) रक्षकों से (च) और (या) जो (मे) मेरे (पदेपदे) प्राप्त होने प्राप्त होने, जानने जानने वा जाने जाने योग्य पदार्थ में (वरूत्री) श्रेष्ठ सुख की देने (जरिमा) और स्तुति करानेवाली (वा) वा (शक्रा) सामर्थ्य में कारण (माता) माता (रस) रस आदि गुणों से युक्त (मही) बड़ी वाणी वा भूमि (ऋजुहस्ता) ऋजु अर्थात् सरल हस्त जिसके वा जिसमें वह (ऋजुवनिः) ऋजु अर्थात् नहीं जो कुटिल उन पदार्थों के विभक्त करनेवाली (नः) हम लोगों को (सिषक्तु) सम्बन्धित करे वह (स्मत्) ही (नि) निरन्तर (धायि) स्थित की जाती है ॥१५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे माता सन्तानों की रक्षा करती है, वैसे ही विद्वानों के संग से प्राप्त और उत्तम प्रकार शिक्षित विद्या विद्वानों की सब प्रकार रक्षा करती है ॥१५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्तुति-वेदवाणी-[सरलता]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु का उपदेश सुनकर जीव निश्चय करता है कि (पदे पदे) = पग-पग पर (मे) = मेरे से (जरिमा) = स्तुति (निधायि) = अपने में स्थापित की जाती है, मैं सतत स्तुति प्रवृत्त होता हूँ। सब कार्यों को प्रभु-स्तवन के साथ करता हूँ। उस स्तुति को करता हूँ जो (वा) = निश्चय से (वरुत्री) = मेरी सब बुराइओं का निवारण करनेवाली है, (च) = और (या) = जो (पायुभिः) = रक्षणों के द्वारा (शक्रा) = सब मुझे सब उत्तम कर्मों के करने की शक्ति प्राप्त कराती है। स्तुति से जीवन पवित्र होता है और शक्तिसम्पन्न बनता है। [२] (नः) = हमें यह (माता) = जीवन का निर्माण करनेवाली वेदमाता (सिषक्तु) = प्राप्त हो जो (मही) = पूज्य है, हमारे जीवनों को महत्त्वपूर्ण बनानेवाली है तथा (रसा) = हमारे जीवनों में रस का सञ्चार करनेवाली है। जो (स्मत्सूरिभिः) = प्रशस्त विद्वानों से हमें प्राप्त होती है [स्मत्=प्रप्रास्तार्थे] तथा (ऋजुहस्ता) = हमारे हाथों को ऋजु बनाती है, अर्थात् जिसको प्राप्त करके हम सरलतायुक्त कर्मों को ही करते हैं, (ऋजुवनिः) = जो हमें आर्जव का सेवन करनेवाला बनाती है, इस वेदवाणी से हमारे हृदय निष्कपट होते हैं। यह आर्जव ही तो ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग है। 'आर्जवं ब्रह्मणः पदम्' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सदा प्रभु-स्मरण के साथ कार्यों को करें, यही पवित्रता व शक्ति प्राप्ति का मार्ग है। हम प्रशस्त विद्वानों से वेदमाता का ज्ञान प्राप्त करें, यह ज्ञान हमें सरल वृत्ति व निष्कपट कर्मोंवाला बनायेगा।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! सूरिभिः पायुभिश्च या मे पदेपदे वरूत्री जरिमा वा शक्रा माता रसा मही ऋजुहस्ता ऋजुवनिर्नः सिषक्तु सा स्मन्निधायि ॥१५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पदेपदे) प्राप्तव्ये प्राप्तव्ये वेदितव्ये वेदितव्ये गन्तव्ये गन्तव्ये वा पदार्थे (मे) मम (जरिमा) स्ताविका (नि) नितराम् (धायि) निधीयते (वरूत्री) वरसुखप्रदा (वा) (शक्रा) शक्तिनिमित्ता (या) (पायुभिः) रक्षणैः (च) (सिषक्तु) सम्बध्नातु (माता) जननी (महा) महती वाग्भूमिर्वा (रसा) रसादिगुणयुक्ता (नः) अस्मान् (स्मत्) एव (सूरिभिः) विद्वद्भिः (ऋजुहस्ता) ऋजू सरलौ हस्तौ यस्या यस्यां वा सा (ऋजुवनिः) ऋजूनामकुटिलानां पदार्थानां संविभाजिका ॥१५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! यथा माताऽपत्यानि रक्षति तथैव विद्वत्सङ्गेन लब्धा सुशिक्षिता विद्या विदुषः सर्वतो रक्षति ॥१५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - At every stage of evolution, my growth with divine praise and prayer is evident, replete with power and grace bearing all natural and divine modes and materials of protection and progress. May mother earth and her nectar sweets of energy with sages and scholars bless us with the rich gifts of her simple, natural and liberal hands.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of Vishvedevāh is further treated.

अन्वय:

O men ! may the mother earth or speech which is full of praise of God, bathe giver of good happiness and power endowed with love and other virtues, straight forward in dealings and the sharer of the straight-forward articles with the learned persons, and with their protective powers in their knowable and attainable objects be united with us. May she be established in us.

भावार्थभाषाः - O men ! as mother nourishes her children, in the same manner, the knowledge acquired well by the association of the enlightened persons protects the learned ones from all sides.
टिप्पणी: पदी -गतौ । गतस्त्रयोऽर्थाः ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्च । अत्र त्रयोऽप्यर्थाः अभिप्रेताः । जरिता इति स्तोतृनाम (NG 3, 16 )।

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! जशी माता संतानाचे रक्षण करते. तसेच विद्वानांच्या संगतीने उत्तम प्रकारे प्राप्त झालेली विद्या विद्वानांचे सर्व प्रकारे रक्षण करते. ॥ १५ ॥