वांछित मन्त्र चुनें
600 बार पढ़ा गया

वात॑स्य यु॒क्तान्त्सु॒युज॑श्चि॒दश्वा॑न्क॒विश्चि॑दे॒षो अ॑जगन्नव॒स्युः। विश्वे॑ ते॒ अत्र॑ म॒रुतः॒ सखा॑य॒ इन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ तवि॑षीमवर्धन् ॥१०॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vātasya yuktān suyujaś cid aśvān kaviś cid eṣo ajagann avasyuḥ | viśve te atra marutaḥ sakhāya indra brahmāṇi taviṣīm avardhan ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वात॑स्य। यु॒क्तान्। सु॒ऽयुजः॑। चि॒त्। अश्वा॑न्। क॒विः। चि॒त्। ए॒षः। अ॒ज॒ग॒न्। अ॒व॒स्युः। विश्वे॑। ते॒। अत्र॑। म॒रुतः॑। सखा॑यः। इन्द्र॑। ब्रह्मा॑णि। तवि॑षीम्। अ॒व॒र्ध॒न् ॥१०॥

600 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:31» मन्त्र:10 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:30» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:2» मन्त्र:10


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) विद्वन् ! जो (ते) आपके (अत्र) इस शिल्पविद्या के जाननेरूप कार्य्य में (सखायः) मित्र (विश्वे) सम्पूर्ण (मरुतः) ऋतु-ऋतु में यज्ञ करनेवाले विद्वान् जन (ब्रह्माणि) धनों वा अन्नों की और (तविषीम्) सेना की (अवर्धन्) वृद्धि करते हैं और (वातस्य) वायु के वेग से (युक्तान्) युक्त हुए (सुयुजः) उत्तम प्रकार पदार्थों के मेल करनेवाले (चित्) निश्चित (अश्वान्) शीघ्रगामी अर्थात् तीव्र वेगयुक्त अग्नि आदि पदार्थों को (अजगन्) चलावें उनको (एषः) यह वर्त्तमान (अवस्युः) अपने को रक्षण की इच्छा रखनेवाले (कविः, चित्) निश्चित बुद्धिमान् आप निरन्तर सत्कार करें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - हे ऐश्वर्य्य की इच्छा रखनेवाले पुरुष ! जो अग्नि आदि पदार्थों की विद्या से विचित्र आश्चर्य्यजनक वाहन आदि कार्य्यों की सिद्धि कर सकते हैं, उनके साथ मित्रता करके और उनसे विद्या को प्राप्त हो अभीष्ट कार्य्यों को सिद्धि करते हुए आप अत्यन्त ऐश्वर्य्य को प्राप्त होवें ॥१०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कवि-अवस्युः

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) = ऐश्वर्यशाली परमात्मन् ! जैसे (कविः चित्) = क्रान्तदर्शी (अवस्युः) = गमन का इच्छुक (वातस्य) = वायु के बल से (सुयुजः) = अच्छी प्रकार जुड़नेवाले (युक्तान्) = जुड़े हुए (अश्वान्) = घोड़ों या वाहनों को (अजगन्) = नियन्त्रित कर चलाता है। उसी प्रकार (विश्वे) = सब (अत्र) = यहाँ (मरुतः) = प्राणापान (सखायः) = मित्रभाव से (ब्रह्माणि) = परब्रह्म (ते तविषीम्) = वे प्राणों के साथियों को, यम-नियमों को (अवर्धन्) = बढ़ायें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जिस प्रकार एक कुशल चालक अपने घोड़ों को वाहन को नियन्त्रित रखता उसी प्रकार योग द्वारा प्राणों को नियन्त्रित करता है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे इन्द्र ! ये तेऽत्र सखायो विश्वे मरुतो ब्रह्माणि तविषीं चावर्धन् वातस्य युक्तान् सुयुजश्चिदश्वानजगन् गमयेयुस्तानेषोऽवस्युः कविश्चिद्भवान् सततं सत्कुर्यात् ॥१०॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वातस्य) वायोर्वेगेन (युक्तान्) (सुयुजः) ये सुष्ठु युञ्जते तान् (चित्) अपि (अश्वान्) आशुगामिनोऽग्न्यादीन् (कविः) मेधावी (चित्) अपि (एषः) वर्त्तमानः (अजगन्) गमयेयुः (अवस्युः) आत्मनोऽवो रक्षणमिच्छुः (विश्वे) सर्वे (ते) तव (अत्र) अस्मिञ्छिल्पविद्याकर्मणि (मरुतः) ऋत्विजो विद्वांसः (सखायः) सुहृदः (इन्द्र) विद्वन् (ब्रह्माणि) धनान्यन्नानि वा (तविषीम्) सेनाम् (अवर्धन्) वर्धयन्ति ॥१०॥
भावार्थभाषाः - हे ऐश्वर्यमिच्छुक ! येऽग्न्यादिपदार्थविद्ययाऽद्भुतानि यानादिकार्य्याणि साद्धुं शक्नुवन्ति तैः सह मैत्रीं कृत्वा विद्यां प्राप्याभीष्टानि कार्य्याणि साधयन् भवान् महदैश्वर्य्यं प्राप्नुयात् ॥१०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let this scholar of creative vision working for defence and protection, take to, explore and advance the forceful currents of winds employed as effective agents of travel and transport. All your scholars, friends and forces here, O powerful ruler, at the speed of winds increase and advance the power, prosperity and defence potential of the land.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of machines is continued.

अन्वय:

O learned person ! you should always honor all those your friends, who are highly learned and performers of Yajnas who augment your wealth or food grains and defen men and their equipment and who use fire, electricity etc. and are endowed with the speed (velocity. Ed.) of the wind and harness well.

भावार्थभाषाः - O man! desirous of obtaining wealth and prosperity, you should develop friendship with the persons who can accomplish wonderful jobs like the manufacturing of vehicles by the knowledge of the science of Agni (fire/energy and electricity). Having acquired that knowledge, yon can accomplish desired purposes and obtain abundant wealth.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे ऐश्वर्य इच्छुकांनो! जे लोक अग्नी इत्यादी पदार्थविद्येद्वारे अद्भुत व आश्चर्यजनक वाहने इत्यादी तयार करतात. त्यांच्याबरोबर मैत्री करून व विद्या प्राप्त करून अभीष्ट कार्य परिपूर्ण करून अत्यंत ऐश्वर्य भोगा. ॥ १० ॥