अन॑स्वन्ता॒ सत्प॑तिर्मामहे मे॒ गावा॒ चेति॑ष्ठो॒ असु॑रो म॒घोनः॑। त्रै॒वृ॒ष्णो अ॑ग्ने द॒शभिः॑ स॒हस्रै॒र्वैश्वा॑नर॒ त्र्य॑रुणश्चिकेत ॥१॥
anasvantā satpatir māmahe me gāvā cetiṣṭho asuro maghonaḥ | traivṛṣṇo agne daśabhiḥ sahasrair vaiśvānara tryaruṇaś ciketa ||
अन॑स्वन्ता। सत्ऽप॑तिः। म॒म॒हे॒। मे॒। गावा॑। चेतिष्ठः॑। असु॑रः। म॒घोनः॑। त्रै॒वृ॒ष्णः। अ॒ग्ने॒। द॒शऽभिः॑। स॒हस्रैः॑। वैश्वा॑नर। त्रिऽअ॑रुणः। चि॒के॒त॒ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब छः ऋचावाले सत्ताईसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निसादृश्य से विद्वान् के गुणों को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
शरीर शकट
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथाग्निसादृश्येन विद्वद्गुणानाह ॥
हे वैश्वानराग्ने ! सत्पतिर्दशभिः सहस्रैरनस्वन्ता गावा सह चेतिष्ठोऽसुरस्त्रैवृष्णस्त्र्यरुणः संस्त्वं मे मघोनश्चिकेत तमहं मामहे ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The duties of Agni (the enlightened persons) are told.
O Agni (learned leader)! shining in all, you are protector of good men. You, and your tens of thousands of persons follow owner of dependable and good transport. Enlightener of all with noble speech, taking delight in the breath exercises showerer of happiness, peace and bliss, you are endowed with three virtues of truth, justice and kindness, or self-control charity and shown kindness by your wealthy persons. Therefore I honor you.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नी, विद्वान व राजा यांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
