अग्ने॑ पावक रो॒चिषा॑ म॒न्द्रया॑ देव जि॒ह्वया॑। आ दे॒वान्व॑क्षि॒ यक्षि॑ च ॥१॥
agne pāvaka rociṣā mandrayā deva jihvayā | ā devān vakṣi yakṣi ca ||
अग्ने॑। पा॒व॒क॒। रो॒चिषा॑। म॒न्द्रया॑। दे॒व॒। जि॒ह्वया॑। आ। दे॒वान्। व॒क्षि॒। यक्षि॑। च॒ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब नव ऋचावाले छब्बीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निपदवाच्य विद्वान् के गुणों को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'रोचिषा – मन्द्रयाजिह्वया' [ज्ञान+स्तुति]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथाग्निपदवाच्यविद्वद्गुणानाह ॥
हे पावक देवाग्ने ! यतस्त्वं रोचिषा मन्द्रया जिह्वयाऽत्र देवाना वक्षि यक्षि च तस्मादर्चनीयोऽसि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of Agni (a highly learned man) are told.
O learned person! giver of knowledge and purifier like the fire; you are to be worshipped. With your very pleasing speech which is giver of the knowledge and bliss, you approach others and, honor and become associated with the enlightened persons, endowed with divine attributes.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)x
