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अं॒हो॒युव॑स्त॒न्व॑स्तन्वते॒ वि वयो॑ म॒हद्दु॒ष्टरं॑ पू॒र्व्याय॑। स सं॒वतो॒ नव॑जातस्तुतुर्यात्सिं॒हं न क्रु॒द्धम॒भितः॒ परि॑ ष्ठुः ॥३॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aṅhoyuvas tanvas tanvate vi vayo mahad duṣṭaram pūrvyāya | sa saṁvato navajātas tuturyāt siṅhaṁ na kruddham abhitaḥ pari ṣṭhuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अं॒हः॒ऽयुवः॑। त॒न्वः॑। त॒न्व॒ते॒। वि। वयः॑। म॒हत्। दु॒स्तर॑म्। पू॒र्व्याय॑। सः। स॒म्ऽवतः॑। नव॑ऽजातः। तु॒तु॒र्या॒त्। सिं॒हम्। न। क्रु॒द्धम्। अ॒भितः॑। परि॑। स्थुः॒ ॥३॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:15» मन्त्र:3 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:5» अनुवाक:2» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जिसके सम्बन्ध में (अंहोयुवः) जो अपराध को दूर करते वे (तन्वः) शरीर के मध्य में (तन्वते) विस्तार को प्राप्त होते और (महत्) बड़े (दुष्टरम्) दुःख से पार होने योग्य (वयः) जीवन को (वि) विशेष करके विस्तृत करते और सुख के (परि) सब ओर (स्थुः) स्थित होते हैं (सः) वह उनका सङ्गी (संवतः) उत्तम प्रकार सेवन किया गया (नवजातः) नवीन अभ्यास से उत्पन्न हुई विद्या जिसकी ऐसा पुरुष (पूर्व्याय) पूर्वज के लिये (क्रुद्धम्) क्रोधयुक्त (सिंहम्) सिंह के (न) सदृश अन्य को (अभितः) सब प्रकार से (तुतुर्यात्) नाश करे ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पाप को दूर करके धर्म का आचरण करते हैं, वे शरीर और आत्मा के सुख और जीवन की वृद्धि कराते हैं। और जैसे क्रुद्ध सिंह प्राप्त हुए प्राणियों का नाश करता है, वैसे प्राप्त हुए दुर्गुणों का सब जन नाश करें ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पाप से पृथक्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पूर्व्याय) = उस सृष्टि के पूर्व होनेवाले, कभी न बननेवाले, सदा वर्तमान प्रभु की प्राप्ति के लिये (अंहोयुवः) = पापों से अपने को पृथक् करनेवाले लोग (तन्वः) = शरीर के (महत्) = महान् (दुष्टरम्) = शत्रुओं से (अजेय वयः) = [strength] शक्ति को (वितन्वते) = विस्तृत करते हैं। शक्ति प्राप्ति के द्वारा ही प्रभु की प्राप्ति होती है 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः'। पापों में फँस जाने से ही शक्ति का ह्रास होता है। पापवृत्ति को अपने से दूर करने से शक्ति का संग्रह होता है और तभी प्रभु की प्राप्ति होती है। [२] (सः) = वह प्रभु को प्राप्त होनेवाला व्यक्ति (नवजात:) = नवीन अथवा स्तुत्य जीवनवाला बना हुआ (संवतः) = संगत शत्रुओं को, समकाम बनाकर आनेवाले काम-क्रोध आदि शत्रुओं को (तुतुर्यात्) = हिंसित करता है । ये शत्रु इसको (परि) = [वर्जयित्वा] छोड़कर इस प्रकार दूर (स्थुः) = स्थित होते हैं, (न) = जैसे कि (क्रुद्धं सिहं अभितः) = क्रुद्ध शेर के चारों ओर दूर भागकर मृग स्थित होते हैं। शेर से भयभीत होकर मृग दूर चले जाते हैं, इसी प्रकार प्रभु प्राप्त व्यक्ति से वासनाएं दूर भाग जाती हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु प्राप्ति के लिये निष्पाप बनकर शक्ति का संग्रह करना आवश्यक है। इस प्रभु प्राप्त व्यक्ति से वासनाएँ दूर भाग जाती हैं।
अन्य संदर्भ: सूचना- संवतः 'शक का अर्थ आचार्य' 'संसेवमान:' करते हैं। उन्होंने 'वन संभक्तौ' से इस शब्द को बनाया है। तब अर्थ इस प्रकार होगा 'प्रभु का सेवन करता हुआ, स्तुत्य जीवनवाला यह व्यक्ति वासनाओं को तैर जाता है'।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यस्यांहोयुवस्तन्वस्तन्वते महद्दुष्टरं वयो वि तन्वते सुखं परि ष्ठुः स तत्सङ्गी संवतो नवजातः पूर्व्याय क्रुद्धं सिंहं नाऽभितस्तुतुर्यात् ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अंहोयुवः) येंऽहोऽपराधं युवन्ति पृथक्कुर्वन्ति ते (तन्वः) शरीरस्य मध्ये (तन्वते) विस्तृणन्ति (वि) (वयः) जीवनम् (महत्) (दुष्टरम्) दुःखेन तरितुं योग्यम् (पूर्व्याय) पूर्वेषु भवाय (सः) (संवतः) संसेवमानः (नवजातः) नवीनाभ्यासेन जातो विद्यावान् (तुतुर्यात्) हिंस्यात् (सिंहम्) (न) इव (क्रुद्धम्) (अभितः) सर्वतः (परि) सर्वतः (स्थुः) तिष्ठन्ति ॥३॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः । ये मनुष्याः पापं दूरीकृत्य धर्ममाचरन्ति ते शरीरात्मसुखं जीवनं च वर्धयन्ति। यथा क्रुद्धः सिंहः प्राप्तान् प्राणिनो हिनस्ति तथा प्राप्तान् दुर्गुणान् सर्वे घ्नन्तु ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Those who eliminate sin and perplexity grow inwardly in the self and offer incomparable gifts of austerities and meditation for the eternal power, Agni within. And he, the lordly power newly arisen in the soul, would, like a passionate lion, destroy the hostile powers prowling around.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of the enlightened persons are mentioned.

अन्वय:

O men ! if a person the righteous men separating all sins in the body extend great and rare new life and then remain happy. That men living in their company becomes highly learned with new practice and destroys all evils as an angry lion destroys the animals that approach him.

भावार्थभाषाः - There is simile in the mantra. Those men who keep themselves away from all sins and observe Dharma (righteousness), augment their physical and spiritual happiness and the span of life. As an angry lion slays the animals that come near him, so men should destroy all evils or vices.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जी माणसे पापाचा त्याग करून धर्माचे आचरण करतात ती शरीर व आत्म्याचे सुख व जीवन वृद्धिंगत करवितात व जसा क्रुद्ध सिंह पकडलेल्या प्राण्यांचा नाश करतो तसे प्राप्त दुर्गुणांचा सर्व लोकांनी नाश करावा. ॥ ३ ॥