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स सद्म॒ परि॑ णीयते॒ होता॑ म॒न्द्रो दिवि॑ष्टिषु। उ॒त पोता॒ नि षी॑दति ॥३॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa sadma pari ṇīyate hotā mandro diviṣṭiṣu | uta potā ni ṣīdati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। सद्म॑। परि॑। नी॒य॒ते॒। होता॑। म॒न्द्रः। दिवि॑ष्टिषु। उ॒त। पोता॑। नि। सी॒द॒ति॒॥३॥

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ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:9» मन्त्र:3 | अष्टक:3» अध्याय:5» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:4» अनुवाक:1» मन्त्र:3


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जो (मन्द्रः) आनन्द का दाता (होता) दानकर्त्ता और (उत) भी (पोता) पवित्र करनेवाला (दिविष्टिषु) पक्षेष्टि आदि उत्तम व्यवहारों के निमित्त (सद्म) बैठते हैं जिसमें उस गृह में (नि, सीदति) बैठता है (सः) वह विद्वान् विद्वानों को (परि) सब प्रकार (नीयते) प्राप्त होता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जहाँ पवित्र आनन्दयुक्त और विद्या आदि के देनेवाले लोग हैं, वहीं सम्पूर्ण विनय होता है ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

होता-पोता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वे प्रभु (सद्म) = शरीरूपी गृह में (परिणीयते) = प्राप्त कराये जाते हैं। उपासक प्रभु को अपने हृदयासन पर बिठाने का प्रयत्न करते हैं। वे प्रभु होता सब कुछ देनेवाले हैं। (मन्द्रः) = आनन्दमय हैं। [२] (उत) = और (दिविष्टिषु) = [दिव् + इष्] ज्ञान की प्रेरणाओं के होने पर पोता हमारे जीवनों को पवित्र करते हुए (निषीदति) = वे प्रभु हमारे में आसीन होते हैं। उपासक का कार्य यह है कि प्रभु को शरीरगृह में प्राप्त कराये। प्रभु का हृदय में आसीन होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ध्यान करे। प्रभु इसे ज्ञान की प्रेरणा देकर पवित्र जीवनवाला बनाते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्याः ! यो मन्द्रो होता उतापि पोता दिविष्टिषु सद्म निषीदति स विद्वद्भिः परिणीयते ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) विद्वान् (सद्म) सीदन्ति यस्मिँस्तत् (परि) सर्वतः (नीयते) (होता) दाता (मन्द्रः) आनन्दप्रदः (दिविष्टिषु) पक्षेष्ट्यादिसद्व्यवहारेषु (उत) अपि (पोता) पवित्रकर्त्ता (नि) (सीदति) ॥३॥
भावार्थभाषाः - यत्र पवित्रा आनन्दिता विद्यादिदातारो जनास्सन्ति तत्रैव समग्रो विनयो भवति ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - 3. That light and power, Agni, sacrificing, sanctifying, happy and rejoicing, is investigated, discovered and worshipped in all holy programmes of life, and everywhere in yajnic homes where it sits as the prime and central presence.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of Agni moves on.

अन्वय:

O men ! that man is taken by the enlightened persons in full statures who gives bliss is a liberal donor and purifier. He is offered a seat for the performance of Paksheshti and other Yajnas (fortnightly and other nonviolent sacrificial rites) as well as good dealings.

भावार्थभाषाः - Where the givers of knowledge are pure and blissful, the humility rests.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जेथे पवित्र, आनंदयुक्त व विद्यादान करणारे लोक असतात तेथे संपूर्ण विनय असतो. ॥ ३ ॥