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स हि वेदा॒ वसु॑धितिं म॒हाँ आ॒रोध॑नं दि॒वः। स दे॒वाँ एह व॑क्षति ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa hi vedā vasudhitim mahām̐ ārodhanaṁ divaḥ | sa devām̐ eha vakṣati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। हि। वेद॑। वसु॑ऽधितिम्। म॒हान्। आ॒ऽरोध॑नम्। दि॒वः। सः। दे॒वान्। आ। इ॒ह। व॒क्ष॒ति॒॥२॥

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ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:8» मन्त्र:2 | अष्टक:3» अध्याय:5» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:4» अनुवाक:1» मन्त्र:2


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जिसको (दिवः) प्रकाश के (आरोधनम्) रोकने और (वसुधितिम्) द्रव्यों के धारण करनेवाले को विद्वान् (वेद) जानता है (सः) वह (हि) जिससे (महान्) बड़ा है और (सः) वह (इह) इस संसार में (देवान्) श्रेष्ठ गुण और भोगों को (आ, वक्षति) प्राप्त कराता है, ऐसा जानो ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जो बिजुलीरूप अग्नि श्रेष्ठ भोग और गुणों का दाता सूर्य्य का भी सूर्य्य और सब का धारण करनेवाला व्याप्त है, उसको जानके कार्य्यों को सिद्ध करो ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वसु-ज्ञान- दिव्यगुण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वे प्रभु (हि) = ही (वसुधितिम्) = सब धनों के धारण को (वेद) = जानते हैं। वे प्रभु हमें सब आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त कराते हैं। वे (महान्) = पूजनीय प्रभु ही (दिव: आरोधनम्) = [आरोहणं] प्रकाशमय लोक के आरोहण को [सीढ़ी को] प्राप्त कराते हैं, अर्थात् उस मार्ग का ज्ञान देते हैं, जिस पर चलकर हम उत्तरोत्तर अपने ज्ञान को बढ़ानेवाने बनते हैं और अन्ततः प्रकाशमय लोक में हमारा निवास होता है । [२] (सः) = वे प्रभु ही सब वसुओं को प्राप्त कराके तथा प्रकाशमय लोक पहुँचने के मार्ग का ज्ञान देकर इह इस जीवन में (देवान्) = सब दिव्य गुणों को आवक्षति प्राप्त कराते हैं। 'निर्धनता व अज्ञान' ये दोनों ही बातें दिव्यगुणों के विकास की विरोधिनी हैं । दिव्य गुणों के विकास के लिये वसुओं की प्राप्ति व ज्ञान आवश्यक हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारे लिये वसुओं को प्राप्त कराते हैं, ज्ञान के मार्ग को दिखाते हैं और इस प्रकार हमें दिव्यगुणों के विकास के लिये तैयार कर देते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यं दिव आरोधनं वसुधितिं विद्वान् वेद स हि महान् वर्त्तत स इह देवानावक्षतीति विजानीत ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) (हि) यतः (वेद) वेत्ति। द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (वसुधितिम्) वसूनां द्रव्याणां धारकम् (महान्) (आरोधनम्) रोधनम् (दिवः) प्रकाशस्य (सः) (देवान्) दिव्यान् गुणान् भोगान् (आ) (इह) (वक्षति) वहति प्रापयति ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्याः ! यो विद्युदग्निर्दिव्यभोगगुणप्रदः सूर्यस्याऽपि सूर्यः सर्वधर्त्ता व्याप्तोऽस्ति तं विदित्वा कार्य्याणि साध्नुत ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ye men and women of the world, that knower alone knows Agni, treasure hold of heavenly light and divine beneficence of universal wealth. That Agni is great, that alone brings us here the light and graces of nature and divinity.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of Agni are elaborated.

अन्वय:

O men! you should know that Agni (energy) gives and controls light and upholds various articles. A learned man (scientist) knows well certainly much about it. That (Agni) conveys to us divine qualities and enjoyments.

भावार्थभाषाः - O men! you should know the properties of the (Agni). It gives divine enjoyment and virtues. It provides light to the sun, upholds and pervades all, who known it and well accomplish all works.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! जो विद्युतरूपी अग्नी श्रेष्ठ भोगांच्या गुणांचा दाता, सूर्याचाही सूर्य, सर्वांना धारण करणारा व सर्वात व्याप्त आहे, त्याला जाणून कार्य सिद्ध करा. ॥ २ ॥