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इन्द्रः॒ सीतां॒ नि गृ॑ह्णातु॒ तां पू॒षानु॑ यच्छतु। स नः॒ पय॑स्वती दुहा॒मुत्त॑रामुत्तरां॒ समा॑म् ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indraḥ sītāṁ ni gṛhṇātu tām pūṣānu yacchatu | sā naḥ payasvatī duhām uttarām-uttarāṁ samām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रः॑। सीता॑म्। नि। गृ॒ह्णा॒तु॒। ताम्। पू॒षा। अनु॑। य॒च्छ॒तु॒। सा। नः॒। पय॑स्वती। दु॒हाम्। उत्त॑राम्ऽउत्तराम्। समा॑म् ॥७॥

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ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:57» मन्त्र:7 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:9» मन्त्र:7 | मण्डल:4» अनुवाक:5» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे खेती करनेवाले जनो ! जो (पयस्वती) बहुत जल से युक्त (नः) हम लोगों के लिये (अनु, यच्छतु) अनुग्रह करे (सा) वह आप लोगों को भी प्राप्त हो और जिस (सीताम्) भूमि जुतानेवाले वस्तु को (इन्द्रः) भूमि को दारण करानेवाला (नि, गृह्णातु) ग्रहण करे (ताम्) उस (दुहाम्) प्रपूरण करनेवाली (उत्तरामुत्तराम्) फिर-फिर बनाई गई (समाम्) शुद्ध सीता अर्थात् भूमि जुतानेवाले वस्तु को (पूषा) पुष्टि करनेवाला देवे, उसका आप लोग भी संयोग करें ॥७॥
भावार्थभाषाः - सब कृषिकर्म करनेवाले जन विद्वान् क्षेत्र जोतनेवालों का अनुकरण करके कृषि की वृद्धि को उत्पन्न करें ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्रःपूषा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = राष्ट्र का शासक राजा (सीताम्) = इस लांगल पद्धति को कृषि कार्य को (निगृह्णातु) = निग्रह में रखे-उन अन्नों को उपजाने का नियम करे, जो कि मानव के लिए हितकर हैं। (पूषा) = समाज शरीर का पोषण करनेवाला वैश्य (ताम्) = उस सीता को (अनुयच्छतु) = राजाज्ञा के अनुसार काबू करे। राजा व्यवस्था करे और वैश्य उस व्यवस्था के अनुसार कृषि कराएँ । [२] (सा) = वह सीता (नः) = हमारे लिए (पयस्वती) = आप्यायन के हेतुभूत अन्नों के देनेवाली होती हुई (उत्तरां उत्तरां समाम्) = अगले-अगले वर्षों में (दुहाम्) = उत्तम अन्नों का दोहन करनेवाली हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- कृषि पर भी राजा का नियन्त्रण हो, वैश्य उसे अनुकूलता से कराएँ ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे कृषीवला ! या पयस्वती नोऽनु यच्छतु सा युष्मानपि प्राप्नोतु यां सीतामिन्द्रो नि गृह्णातु तां दुहामुत्तरामुत्तरां समां सीतां पूषानु यच्छतु तां यूयमपि सम्प्रयुङ्ध्वम् ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) भूमेर्दारयिता (सीताम्) भूमिकर्षिकाम् (नि) (गृह्णातु) (ताम्) (पूषा) पुष्टिकर्त्ता (अनु) (यच्छतु) अनुगृह्णातु (सा) (नः) अस्मभ्यम् (पयस्वती) बहूदकयुक्ता (दुहाम्) प्रापूरिकाम् (उत्तरामुत्तराम्) पुनः पुनर्निर्मिताम् (समाम्) शुद्धाम् ॥७॥
भावार्थभाषाः - सर्वे कृषीवला विदुषां कर्षकानामनुकरणं कृत्वा कृष्युन्नतिं निष्पादयेयुः ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let Indra, the farmer, take over and look after the furrow with seed, and may the sun shine warmly over the seed. Let Pusha, fertility of nature, feed and energise the grain. And let the earth mother, full of the milk of life, produce more and more of pure foods year by year for us.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of farming is further highlighted.

अन्वय:

O farmers ! full of waters be harnessed by you. Mayay the river or canal, digger of the earth take in hand the furrow and may the nourisher direct or use it properly. May he utilize this furrow which stimulates the desire of vast growth of food, and the land he cultivated again and again to make it pure and fertile. So you should also do.

भावार्थभाषाः - All farmers should follow the instructions given by the expert, experienced and highly agriculture scientists and thus increase and improve the production of agriculture.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - सर्व कृषितंत्रज्ञ लोकांनी शेत नांगरणाऱ्यांचे अनुकरण करून शेतीची वृद्धी करावी. ॥ ७ ॥