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इन्द्र॑ज्येष्ठान्बृ॒हद्भ्यः॒ पर्व॑तेभ्यः॒ क्षयाँ॑ एभ्यः सुवसि प॒स्त्या॑वतः। यथा॑यथा प॒तय॑न्तो वियेमि॒र ए॒वैव त॑स्थुः सवितः स॒वाय॑ ते ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrajyeṣṭhān bṛhadbhyaḥ parvatebhyaḥ kṣayām̐ ebhyaḥ suvasi pastyāvataḥ | yathā-yathā patayanto viyemira evaiva tasthuḥ savitaḥ savāya te ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र॑ऽज्येष्ठान्। बृ॒हत्ऽभ्यः॑। पर्व॑तेभ्यः। क्षया॑न्। ए॒भ्यः॒। सु॒व॒सि॒। प॒स्त्य॑ऽवतः। यथा॑ऽयथा। प॒तय॑न्तः। वि॒ऽये॒मि॒रे। ए॒व। ए॒व। त॒स्थुः॒। स॒वि॒त॒रिति॑। स॒वाय॑। ते॒ ॥५॥

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ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:54» मन्त्र:5 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:5» मन्त्र:5 | मण्डल:4» अनुवाक:5» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सवितः) जगदीश्वर ! आप (यथायथा) जैसे जैसे (बृहद्भ्यः) बड़े (एभ्यः) इन (पर्वतेभ्यः) मेघादिकों से (पस्त्यावतः) प्रशंसित गृहों से युक्त (इन्द्रज्येष्ठान्) बिजुली वा सूर्य्य बड़े जिनमें उन (क्षयान्) निवासों को (सुवसि) प्रेरणा करते हो, वैसे-वैसे (पतयन्तः) पति के सदृश आचरण करते हुए (एव) ही सब (वियेमिरे) विशेष करके देते हैं और (ते) आपके (सवाय) ऐश्वर्य्य के लिये (एव) ही (तस्थुः) स्थित होते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे भगवन् ! आपने सब जीवों के निवासादि व्यवहार के लिये भूमि आदि लोक रचे, इसी से आपके लिये धन्यवादों को समर्पण करके हम लोग आपके ऐश्वर्य्य में निवास करें ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (बृहद्भ्यः) = [बृहि वृद्धौ] वृद्धि के मार्ग पर चलनेवाले (पर्वतेभ्यः) = अपना पूरण करनेवाले (एभ्यः) = इन लोगों के लिए, हे (सवितः)= सर्वोत्पादक प्रभो ! (इन्द्रज्येष्ठान्) = [इन्द्र: ज्येष्ठः येषु] प्रभु ही जिनमें ज्येष्ठ हैं, अर्थात् सदा प्रभु के स्मरणवाले (पस्त्यावतः) = उत्तम गृहों [कमरों] वाले (क्षयान्) = निवास स्थानों को (सुवसि) = आप प्राप्त कराते हैं । [२] इन घरों में रहते हुए वे लोग (यथा यथा) = जैसे-जैसे (पतयन्तः) = आपकी ओर गति करते हुए ये (वियेमिरे) = यम-नियम से युक्त जीवनवाले होते हैं, (एव एव) = उस उस प्रकार (ते) = आपके (सवाय) = ऐश्वर्य के लिए (तस्थुः) = स्थित होते हैं । ये प्रभुभक्त संयत जीवनवाले होते हुए आपकी ओर आते हैं और आपके ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें प्रभु की उपासनावाले गृह प्राप्त हों ऐसे घरों में ही हमारा जन्म हो। वहाँ प्रभु की ओर चलते हुए जीवनवाले बनकर हम प्रभु के ऐश्वर्य को प्राप्त करें ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे सवितर्जगदीश्वर ! त्वं यथायथा बृहद्भ्य एभ्यः पर्वतेभ्यः पस्त्यावत इन्द्रज्येष्ठान् क्षयान् सुवसि तथा तथा पतयन्त एव सर्वे वियेमिरे ते सवायैव तस्थुः ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रज्येष्ठान्) इन्द्रो विद्युत्सूर्य्यो वा ज्येष्ठो येषां तान् (बृहद्भ्यः) महद्भ्यः (पर्वतेभ्यः) मेघादिभ्यः (क्षयान्) निवासान् (एभ्यः) (सुवसि) (पस्त्यावतः) प्रशंसितानि पस्त्यानि विद्यन्ते येषु तान् (यथायथा) (पतयन्तः) पतिरिवाचरन्तः (वियेमिरे) विशेषेण नियच्छन्ति (एव) निश्चये (एव) (तस्थुः) तिष्ठन्ति (सवितः) जगदीश्वर (सवाय) ऐश्वर्य्याय (ते) तव ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे भगवन् ! भवता सर्वेषां जीवानां निवासादिव्यवहाराय भूम्यादिलोका निर्मिता अत एव भवन्तं धन्यवादान् समर्प्य वयं तवैश्वर्य्ये निवसाम ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Savita, O lord creator, you create the stars and forces great as the sun and cosmic energy, greater than the mighty mountains and the thunderous clouds, and you create the regions and orbits for these wherein they abide like home dwellers. And as these fly around and observe the cosmic law, so they abide for your honour and grandeur doing homage to your glory.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The varied activities of the enlightened persons is continued.

अन्वय:

O God, Creator of the world ! You make from clouds etc. these dwelling places, where are many houses to live in and where electricity or the sun are the most powerful. Behaving so, the lords or owners give us benefits more and more. They stand to glorify your great wealth or prosperity.

भावार्थभाषाः - O God + You have made the earth and others for the habitation of all souls. So we thank, express our gratitude and live under Your Great Prosperity.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे भगवान ! तू सर्व जीवांच्या निवासासाठी भूमी इत्यादी निर्माण केलेली आहेस, त्यासाठी तुला धन्यवाद देतो. आम्ही तुझ्या या ऐश्वर्यात निवास करतो. ॥ ५ ॥