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अ॒स्य श्रि॒ये स॑मिधा॒नस्य॒ वृष्णो॒ वसो॒रनी॑कं॒ दम॒ आ रु॑रोच। रुश॒द्वसा॑नः सु॒दृशी॑करूपः क्षि॒तिर्न रा॒या पु॑रु॒वारो॑ अद्यौत् ॥१५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asya śriye samidhānasya vṛṣṇo vasor anīkaṁ dama ā ruroca | ruśad vasānaḥ sudṛśīkarūpaḥ kṣitir na rāyā puruvāro adyaut ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य। श्रि॒ये। स॒म्ऽइ॒धा॒नस्य॑। वृष्णः॑। वसोः॑। अनी॑कम्। दमे॑। आ। रु॒रो॒च॒। रुश॑त्। वसा॑नः। सु॒दृशी॑कऽरूपः। क्षि॒तिः। न। रा॒या। पु॒रु॒ऽवारः॑। अ॒द्यौ॒त्॥१५॥

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ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:5» मन्त्र:15 | अष्टक:3» अध्याय:5» वर्ग:3» मन्त्र:5 | मण्डल:4» अनुवाक:1» मन्त्र:15


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (रुशत्) सुन्दर रूप को (वसानः) प्राप्त (सुदृशीकरूपः) उत्तम प्रकार देखने योग्य स्वरूप से युक्त (पुरुवारः) सब से स्वीकार करने योग्य स्वरूप से शोभित तथा (राया) धन से (क्षितिः) पृथिवी के (न) समान (अद्यौत्) प्रकाशित होता है, जिस (समिधानस्य) प्रकाशमान (वृष्णः) बलिष्ठ (वसोः) वसानेवाले राजा के (दमे) गृह में (श्रिये) शोभा वा लक्ष्मी के लिये (अनीकम्) सेना (आ) सब प्रकार (रुरोच) सुन्दर है, उस सेना के और (अस्य) इस वर्त्तमान राजा के सम्पूर्ण समाधान और सुख होते हैं ॥१५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अच्छे रूपवान् पृथिवी के सदृश क्षमा आदि गुणवाले और प्रतिष्ठित चक्रवर्त्ती राजाओं की लक्ष्मी से शोभित हुए उत्तम प्रकार शिक्षित बड़ी बलवती बड़ी सेना को बढ़ाते हैं, उनका ही चक्रवर्त्ती राज्य संभावित होता है औरों का नहीं ॥१५॥ इस सूक्त में बुद्धिमान्, राजा, अध्यापक, उपदेशक, प्रश्नकर्ता और समाधानकर्ता के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१५॥ यह पाँचवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के तेज से शोभा की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्य) = इस (समिधानस्य) = हृदय देश में दीप्त होते हुए (वृष्ण:) = शक्तिशाली (वसोः) = हम सबके निवास के कारणभूत प्रभु का (अनीकम्) = तेज [brightness] (दमे) = इस शरीर-गृह में आरुरोच समन्तात् दीप्त होता है। यह प्रभु के तेज का दीप्त होना ही (श्रिये) = इस की श्री के लिये होता है। जो श्री है वह उस प्रभु के तेज के अंश से ही तो उत्पन्न हुई है 'यद् यद् विभूतिमंत् सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंश संभवम्' । [२] वे प्रभु (रुशत्) = देदीप्यमान हैं, (वसान:) = सब को बसानेवाले हैं, (सुदृशीकरूपः) = उत्तम दर्शनीय रूपवाले हैं। वे प्रभु (पुरुवार:) = बहुतों से वरणीय हैं, अर्थात् अनन्तः सभी प्रभु का वरण करते हैं। अथवा अनन्त वरणीय वस्तुओंवाले हैं। (अद्यौत्) = वे प्रभु हमारे अन्दर दीप्त होते हैं। वे प्रभु इस प्रकार हमारे अन्दर दीप्त होते हैं (न) = जैसे कि (राया) = धन से (क्षितिः) = इस पृथिवी पर निवास करनेवाला मनुष्य शोभा वाला होता है। धन से मनुष्य धन्य बनता है, तो सब धनों के ईश्वर उस पुरुवार प्रभु से तो वह कितनी ही अधिक शोभावाला होगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का तेज हमारे में दीप्त होता है तो हम शोभा ही शोभावाले हो जाते हैं। सूक्त का भाव यह है कि हम वैश्वानर प्रभु का उपासन करें। प्रभु से वेदज्ञान को प्राप्त करके तदनुसार आचरण करते हुए हम प्रभु के तेज से अपने जीवन को दीप्त करें। अगले सूक्त में भी प्रभु का ही अग्नि नाम से स्मरण है -

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

यो रुशद्वसानः सुदृशीकरूपः पुरुवारो राया क्षितिर्नाद्यौत् यस्य समिधानस्य वृष्णो वसो राज्ञो दमे श्रियेऽनीकमारुरोच। तस्या अस्य सर्वाणि समाधानानि सुखानि च भवन्ति ॥१५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) वर्त्तमानस्य (श्रिये) शोभनायै लक्ष्म्यै वा (समिधानस्य) देदीप्यमानस्य (वृष्णः) बलिष्ठस्य (वसोः) वासयितुः (अनीकम्) सैन्यम् (दमे) गृहे (आ) समन्तात् (रुरोच) रोचते (रुशत्) सुन्दरं रूपम् (वसानः) प्राप्तः (सुदृशीकरूपः) सुष्ठु दर्शनीयस्वरूपः (क्षितिः) पृथिवी (न) इव (राया) धनेन (पुरुवारः) बहुभिर्वरणीयस्वरूपः (अद्यौत्) प्रकाशते ॥१५॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। ये सुरूपवन्तः पृथिवीवत् क्षमादिगुणा बहु प्रतिष्ठिताश्चकवर्त्तिराज्यश्रिया सुशोभिताः सन्तः सुशिक्षितां महाबलवतीं महतीं सेनामुन्नयन्ति तेषामेव चक्रवर्त्तिराज्यं संभाव्यते नेतरेषामिति ॥१५॥ अत्राऽग्निमेधाविराजाऽध्यापकोपदेशकप्रच्छकसमाधातृगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥१५॥ इति पञ्चमं सूक्तं तृतीयो वर्गश्च समाप्तः ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the expression of the grace and majesty of this Agni, lord of light and ruler of the world, bright and blazing, generous, home and haven of all like mother earth, his force and splendour shines in his home. And he himself, refulgent giver of radiance, magnificent in form, treasure home and universal giver of heavenly and earthly gifts for all, shines with regal magnificence and wealth of the world like mother earth shining with the greenery of her abundance and generosity.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of inquisitiveness is elaborated.

अन्वय:

He alone can enjoy all happiness and have full satisfaction, who is beautiful, possessing lovely form, and acceptable and glorified by many shines like the wealth of earth. It is like that king who is splendid, mighty and gives shelter and inhabitation to many in his home and State, and for whose majesty and prosperity big army shines on all sides.

भावार्थभाषाः - Only those can be the sovereigns of a very vast government who are beautiful (internally and externally), endowed with forgiveness endurance and other virtues like the earth and are very respectable. Well admired with the prosperity of an empire, they raise very powerful well trained army.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे स्वरूपवान पृथ्वीप्रमाणे क्षमा इत्यादी गुणांनी युक्त, प्रतिष्ठित, चक्रवर्ती राजलक्ष्मीने, शोभित झालेली प्रशिक्षित बलवान सेना वाढवितात, त्यांचेच चक्रवर्ती राज्य शक्य आहे, इतरांचे नाही. ॥ १५ ॥