वायो॑ शु॒क्रो अ॑यामि ते॒ मध्वो॒ अग्रं॒ दिवि॑ष्टिषु। आ या॑हि॒ सोम॑पीतये स्पा॒र्हो दे॑व नि॒युत्व॑ता ॥१॥
vāyo śukro ayāmi te madhvo agraṁ diviṣṭiṣu | ā yāhi somapītaye spārho deva niyutvatā ||
वायो॒ इति॑। शु॒क्रः। अ॒या॒मि॒। ते॒। मध्वः॑। अग्र॑म्। दिवि॑ष्टिषु। आ। या॒हि॒। सोम॑ऽपीतये। स्पा॒र्हः। दे॒व॒। नि॒युत्व॑ता ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब चार ऋचावाले सैंतालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में वायुसादृश्य से विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥१॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
क्रियाशीलता रूप स्पृहणीय देव
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ वायुसादृश्येन विद्वद्गुणानाह ॥
हे देव वायो ! स्पार्हः शुक्रोऽहं दिविष्टिषु नियुत्वता सह सोमपीतये ते मध्वोऽग्रं यथायामि तथा त्वमायाहि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of the enlightened persons are compared with the air.
O learned person ! mighty like the wind, I am desirous of pure nature. It come to you who are sweet- natured in bright activities like drinking good Soma juice in the company of the king. You should also come to me.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात विद्वान राजा व अमात्याच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
