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वायो॑ शु॒क्रो अ॑यामि ते॒ मध्वो॒ अग्रं॒ दिवि॑ष्टिषु। आ या॑हि॒ सोम॑पीतये स्पा॒र्हो दे॑व नि॒युत्व॑ता ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vāyo śukro ayāmi te madhvo agraṁ diviṣṭiṣu | ā yāhi somapītaye spārho deva niyutvatā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वायो॒ इति॑। शु॒क्रः। अ॒या॒मि॒। ते॒। मध्वः॑। अग्र॑म्। दिवि॑ष्टिषु। आ। या॒हि॒। सोम॑ऽपीतये। स्पा॒र्हः। दे॒व॒। नि॒युत्व॑ता ॥१॥

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ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:47» मन्त्र:1 | अष्टक:3» अध्याय:7» वर्ग:23» मन्त्र:1 | मण्डल:4» अनुवाक:5» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब चार ऋचावाले सैंतालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में वायुसादृश्य से विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (देव) विद्वन् (वायो) वायु के सदृश वर्त्तमान ! (स्पार्हः) ईप्सा करने योग्य (शुक्रः) शुद्ध स्वभाववाला मैं (दिविष्टिषु) प्रकाश के बीच जो स्थित क्रिया उनमें (नियुत्वता) समर्थ राजा के साथ (सोमपीतये) उत्तम रस के पान के लिये (ते) आपके (मध्वः) मधुर रस के (अग्रम्) अग्रभाग को जैसे (अयामि) प्राप्त होता हूँ, वैसे आप (आ, याहि) प्राप्त होओ ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो वायु के सदृश सर्वत्र विहार करके विद्या का ग्रहण करते हैं, वे सर्वत्र ईप्सा करने योग्य होते हैं ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

क्रियाशीलता रूप स्पृहणीय देव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वायो) = क्रियाशीलता रूप दिव्यगुण ! (शुक्रः) = व्रत से दीप्त हुआ हुआ मैं (ते) = तेरे लिए (दिविष्टिषु) = [दिव: एषणेषु] ज्ञानप्राप्ति की कामनाओं के होने पर (अग्रम्) = सर्वप्रथम (मध्वः) = सोम को (अयामि) = आययामि [अयतिरन्तर्भावितण्यर्थः] प्राप्त कराता हूँ। क्रियाशीलता से वासनाओं का आक्रमण न होकर, सोम का रक्षण होता है। इससे ज्ञानाग्नि दीप्त होती है। [२] हे (देव) = क्रियाशीलता रूप दिव्यगुण! (स्पार्हः) = तू स्पृहणीय है। तू (नियुत्वता) = प्रशस्त इन्द्रियाश्वोंवाले इस शरीर रथ से (सोमपीतये) = सोमरक्षण के लिए (आयाहि) = हमें प्राप्त हो । क्रियाशीलता से ही हमें सोमपान के योग्य बनाना है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ– क्रियाशील बनकर हम सोम का रक्षण करें। यह सोम हमें ज्ञान का प्रकाश प्राप्त कराएगा।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ वायुसादृश्येन विद्वद्गुणानाह ॥

अन्वय:

हे देव वायो ! स्पार्हः शुक्रोऽहं दिविष्टिषु नियुत्वता सह सोमपीतये ते मध्वोऽग्रं यथायामि तथा त्वमायाहि ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वायो) (शुक्रः) शुद्धस्वभावः (अयामि) प्राप्नोमि (ते) तव (मध्वः) मधुरस्य (अग्रम्) (दिविष्टिषु) प्रकाशे स्थितासु क्रियासु (आ) (याहि) (सोमपीतये) उत्तमरसपानाय (स्पार्हः) स्पर्हणीयः (देव) (नियुत्वता) प्रभुणा राज्ञा सह ॥१॥
भावार्थभाषाः - ये वायुवत्सर्वत्र विहृत्य विद्याग्रहणं कुर्वन्ति ते सर्वत्र स्पर्हणीया जायन्ते ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vayu, lord omnipotent, self-refulgent and generous centre object of universal love, I come to the top of the honey sweets of yajnic creations of light and joy for the life divine, cleansed and pure as I am now. Come for a drink of soma by the chariot and the team of horses.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of the enlightened persons are compared with the air.

अन्वय:

O learned person ! mighty like the wind, I am desirous of pure nature. It come to you who are sweet- natured in bright activities like drinking good Soma juice in the company of the king. You should also come to me.

भावार्थभाषाः - Those who acquire knowledge by moving every- where like the wind, become desirable or acceptable everywhere.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात विद्वान राजा व अमात्याच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - जे वायूप्रमाणे सर्वत्र विहार करून विद्या ग्रहण करतात, ते सर्वत्र वांछनीय असतात. ॥ १ ॥