रथे॑न पृथु॒पाज॑सा दा॒श्वांस॒मुप॑ गच्छतम्। इन्द्र॑वायू इ॒हा ग॑तम् ॥५॥
rathena pṛthupājasā dāśvāṁsam upa gacchatam | indravāyū ihā gatam ||
रथे॑न। पृ॒थु॒ऽपाज॑सा। दा॒श्वांस॑म्। उप॑। ग॒च्छ॒त॒म्। इन्द्र॑वायू॒ इति॑। इ॒ह। आ। ग॒त॒म् ॥५॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
जितेन्द्रियता व क्रियाशीलता
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
हे इन्द्रवायू इव प्रतापिनौ राजसेनेशौ ! युवां पृथुपाजसा रथेनेहाऽऽगतं दाश्वांसमुपगच्छतम् ॥५॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
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