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स न॑श्चि॒त्राभि॑रद्रिवोऽनव॒द्याभि॑रू॒तिभिः॑। अना॑धृष्टाभि॒रा ग॑हि ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa naś citrābhir adrivo navadyābhir ūtibhiḥ | anādhṛṣṭābhir ā gahi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। नः॒। चि॒त्राभिः॑। अ॒द्रि॒ऽवः॒। अ॒न॒व॒द्याभिः॑। ऊ॒तिऽभिः॑। अना॑धृष्टाभिः। आ। ग॒हि॒ ॥५॥

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ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:32» मन्त्र:5 | अष्टक:3» अध्याय:6» वर्ग:27» मन्त्र:5 | मण्डल:4» अनुवाक:3» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अद्रिवः) मेघों के सम्बन्ध से युक्त सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान राजन् ! (सः) वह आप (चित्राभिः) अद्भुत (अनवद्याभिः) प्रशंसा करने योग्य (अनाधृष्टाभिः) शत्रुओं से दबाने को नहीं योग्य (ऊतिभिः) रक्षादिकों के साथ (नः) हम लोगों को (आ, गहि) प्राप्त हूजिये ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे प्रजाजनो ! जैसे राजा आप लोगों की सब प्रकार रक्षा करे, वैसे आप लोग भी राजा की सब प्रकार रक्षा करो ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'चित्र-अनवद्य-अनाधृष्ट-रक्षण'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अद्रिवः) = वज्रवन्- क्रियाशीलता रूप वज्रवाले प्रभो ! (सः) = वे आप (नः) = हमें (ऊतिभिः) = रक्षणों के साथ (आगहि) = प्राप्त होइये । वस्तुतः प्रभु के बिना हम शत्रुओं के आक्रमण से अपना रक्षण किसी भी प्रकार नहीं कर सकते। [२] हे प्रभो! आप उन रक्षणों के साथ हमें प्राप्त होइये, जो कि (चित्राभि:) = [चित् र] हमारे लिए उत्कृष्ट ज्ञानों को देनेवाले हैं। (अनवद्याभि:) = जो रक्षण अत्यन्त प्रशस्त हैं, जिन रक्षणों द्वारा हमारा मन वासनाओं से मलिन नहीं होता। (अनाधृष्टाभिः) = जो रक्षण अनाधृष्ट हैं। इन रक्षणों के होने पर हमारे शरीर रोगों से आक्रान्त नहीं होते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के रक्षण हमें मस्तिष्क में ज्ञान-सम्पन्न [चित्र], मन में अनवद्य [= प्रशस्त भावोंवाला] तथा शरीर में अनाधृष्ट [नीरोग] बनाते हैं।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे अद्रिवो राजन् ! स त्वं चित्राभिरनवद्याभिरनाधृष्टाभिरूतिभिः सह नोऽस्मानागहि ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) (नः) अस्माकम् (चित्राभिः) अद्भुताभिः (अद्रिवः) अद्रयो मेघा विद्यन्ते सम्बन्धे यस्य सूर्यस्य तद्वद्वर्त्तमान (अनवद्याभिः) प्रशंसनीयाभिः (ऊतिभिः) रक्षादिभिः (अनाधृष्टाभिः) शत्रुभिर्धर्षितुमयोग्याभिः (आ, गहि) प्राप्नुयाः ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे प्रजाजना यथा राजा युष्मान् सर्वतो रक्षेत्तथा यूयमपि राजानं सर्वथा रक्षत ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Wielder of the thunderbolt of law and justice, come and join us with marvellous, irreproachable, and irresistible modes of defence, protection and promotion.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The king and his subjects are again discussed here.

अन्वय:

O ruler! you are like a sun. As the sun thrashes the clouds, you also reach us with your protective faculties because they are always admired and never reprimanded and repressed. We seek you sincerely.

भावार्थभाषाः - O people! as the king protects you in all possible ways, you should also similarly provide him protection.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे प्रजाजनांनो! जसा राजा तुमचे सर्व प्रकारे रक्षण करतो तसे तुम्हीही राजाचे सर्व प्रकारे रक्षण करा. ॥ ५ ॥