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तमर्व॑न्तं॒ न सा॑न॒सिम॑रु॒षं न दि॒वः शिशु॑म्। म॒र्मृ॒ज्यन्ते॑ दि॒वेदि॑वे ॥६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tam arvantaṁ na sānasim aruṣaṁ na divaḥ śiśum | marmṛjyante dive-dive ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम्। अर्व॑न्तम्। न। सा॒न॒सिम्। अ॒रु॒षम्। न। दि॒वः। शिशु॑म्। म॒र्मृ॒ज्यन्ते॑। दि॒वेऽदि॑वे ॥६॥

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ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:15» मन्त्र:6 | अष्टक:3» अध्याय:5» वर्ग:16» मन्त्र:1 | मण्डल:4» अनुवाक:2» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने राजन् ! जिस (दिवः) प्रकाश से (शिशुम्) पुत्र को (अर्वन्तम्) शीघ्र चलनेवाले घोड़े के (न) सदृश वा (अरुषम्) रक्तगुणों से विशिष्ट के (न) सदृश (सानसिम्) और विभाग करने योग्य पदार्थ को (दिवेदिवे) प्रतिदिन विद्वान् लोग (मर्मृज्यन्ते) शुद्ध करते हैं (तम्) उसको आप पवित्र करो ॥६॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य घोड़े के सदृश सन्तानों को शिक्षा देते हैं, वे नित्य सुख को बढ़ाते हैं ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अर्वन्तम्-अरुषम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तम्) = उस (अर्वन्तं न) = [अर्व killing enemies] शत्रुओं का संहार करनेवाले की तरह (सानसिम्) = सम्भजनीय, (दिवः शिशुं न) = द्युलोक के पुत्र सूर्य की तरह (अरुषम्) = आरोचमान उस प्रभु को उपासक लोग (दिवे दिवे) = प्रतिदिन (मर्मृज्यन्ते) = अपने हृदयों में शुद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। [२] उस प्रभु को शुद्ध करने का भाव यह है कि हृदय में उत्पन्न हुई हुई वासनाओं को दूर करते हैं। ये वासनाएँ ही तो वह मलिन आवरण हैं जो कि हमें प्रभु का दर्शन नहीं होने देते। इस प्रभु का दर्शन होने पर सब वासनाओं का संहार हो जाता है और ज्ञान की दीप्ति चमक उठती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ध्यान द्वारा हृदय को परिमार्जित करते हुए हम प्रतिदिन उस प्रभु के प्रकाश को देखने का प्रयत्न करें। प्रभु हमारे सब वासनारूप शत्रुओं का संहार करके हमें दीप्त जीवनवाला बनाते हैं।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे अग्ने ! दिवः शिशुमर्वन्तं नारुषं न सानसिं दिवेदिवे विद्वांसो मर्मृज्यन्ते तं त्वं पवित्रय ॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) वीरम् (अर्वन्तम्) शीघ्रगामिनमश्वम् (न) इव (सानसिम्) विभक्तव्यम् (अरुषम्) रक्तगुणविशिष्टम् (न) (दिवः) प्रकाशात् (शिशुम्) पुत्रम् (मर्मृज्यन्ते) शोधयन्ति (दिवेदिवे) प्रतिदिनम् ॥६॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः । ये मनुष्या अश्ववत्सन्तानाञ्छिक्षन्ते ते नित्यं सुखं वर्द्धयन्ते ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Him the followers serve, adorn and adore day by day who is lovable and victorious like a war horse and brilliant as a very child of heavenly light.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of the ruler is further highlighted.

अन्वय:

O learned person! purify the infant, got from the light i.e. possessive of knowledge. The enlightened men teach/train him every day like speedy horse. In fact, like a red color person, full of splendor, and analyzing power (in order to distinguish between good and bad traits), they shape him properly.

भावार्थभाषाः - Those persons who train their children well like a horse, augment their happiness.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जी माणसे अश्वाप्रमाणे संतानांना शिक्षण देतात ती नित्य सुख वाढवितात. ॥ ६ ॥