प्रत्य॒ग्निरु॒षसो॑ जा॒तवे॑दा॒ अख्य॑द्दे॒वो रोच॑माना॒ महो॑भिः। आ ना॑सत्योरुगा॒या रथे॑ने॒मं य॒ज्ञमुप॑ नो यात॒मच्छ॑ ॥१॥
praty agnir uṣaso jātavedā akhyad devo rocamānā mahobhiḥ | ā nāsatyorugāyā rathenemaṁ yajñam upa no yātam accha ||
प्रति॑। अ॒ग्निः। उ॒षसः॑। जा॒तऽवे॑दाः। अख्य॑त्। दे॒वः। रोच॑मानाः। महः॑ऽभिः। आ। ना॒स॒त्या॒। उ॒रु॒ऽगा॒या। रथे॑न। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। उप॑। नः॒। या॒त॒म्। अच्छ॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पाँच ऋचावाले चौदहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निसादृश्य से विद्वानों के गुणों का उपदेश करते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दीप्त उषाएँ
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथाग्निसादृश्येन विद्वद्गुणानाह ॥
हे नासत्योरुगायाध्यापकोपदेशकौ ! युवां महोभी रथेन न इमं यज्ञं जातवेदा देवोऽग्नी रोचमाना उषसः प्रत्यख्यद् दिवाऽच्छोपायातम् ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of the scholars comparable with Agni are told.
O highly admired teachers and preachers you are free from evil conduct. Moving along with elders in your transport, you perceive our bright and glaring dealings and the Yajna―the sacrificial acts. As the energy (power electricity,) is existent everywhere and is brightening and (the solar energy) starts from the beginning of the day, you the teachers and preachers come to us nicely.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नी, विद्वान, स्त्री, पुरुष यांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
