प्र का॑रवो मन॒ना व॒च्यमा॑ना देव॒द्रीचीं॑ नयत देव॒यन्तः॑। द॒क्षि॒णा॒वाड्वा॒जिनी॒ प्राच्ये॑ति ह॒विर्भर॑न्त्य॒ग्नये॑ घृ॒ताची॑॥
pra kāravo mananā vacyamānā devadrīcīṁ nayata devayantaḥ | dakṣiṇāvāḍ vājinī prācy eti havir bharanty agnaye ghṛtācī ||
प्र। का॒र॒वः॒। म॒न॒ना। व॒च्यमा॑नाः। दे॒व॒द्रीची॑म्। न॒य॒त॒। दे॒व॒ऽयन्तः॑। द॒क्षि॒णा॒ऽवाट्। वा॒जिनी॑। प्राची॑। ए॒ति॒। ह॒विः। भर॑न्ती। अ॒ग्नये॑। घृ॒ताची॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब ग्यारह ऋचावाले छठे सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के सम्बन्ध से विद्वानों के गुणों को कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभुस्तवन व यज्ञशीलता
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनरग्निसम्बन्धेन विद्वद्गुणानाह।
हे देवद्रीचीं देवयन्तः कारवो यूयं या मनना वच्यमाना दक्षिणावाड्वाजिनी प्राची घृताच्यग्नये हविर्भरन्त्येति ताः प्रणयत ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of the enlightened persons are told.
O devout performers of the Yajna ! moved by deep devotion, bring forth the ladle SRUCHA (the spoon for Homa). It is to be conveyed to the south of the fire-altar ( VEDI ) and charged with the sacrificial food, pointed to the east, and containing the oblations and filled with clarified butter, this ladle proceeds to Yajna - Kunda (Holy Pit).
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात विद्वान व अग्नीचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
