पद्या॑ वस्ते पुरु॒रूपा॒ वपूं॑ष्यू॒र्ध्वा त॑स्थौ॒ त्र्यविं॒ रेरि॑हाणा। ऋ॒तस्य॒ सद्म॒ वि च॑रामि वि॒द्वान्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥
padyā vaste pururūpā vapūṁṣy ūrdhvā tasthau tryaviṁ rerihāṇā | ṛtasya sadma vi carāmi vidvān mahad devānām asuratvam ekam ||
पद्या॑। व॒स्ते॒। पु॒रु॒ऽरूपा॑। वपूं॑षि। ऊ॒र्ध्वा। त॒स्थौ॒। त्रि॒ऽअवि॑म्। रेरि॑हाणा। ऋ॒तस्य॑। सद्म॑। वि। च॒रा॒मि॒। वि॒द्वान्। म॒हत्। दे॒वाना॑म्। अ॒सु॒र॒ऽत्वम्। एक॑म्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
(पद्या) = सूर्य किरणों से प्रकाशित होने योग्य भूमि जो (पुरुरूपा) = प्रभु के बनाए इन (द्यावा) = नानारूपोंवाले (वपूंषि) = शरीरों को वस्ते धारण करती है। यहाँ स्थावर जंगम कितनी ही आकृतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। उधर दूसरी ओर (त्र्यविम्) = तीनों लोकों के रक्षक सूर्य को (रेरिहाणा) = चाटतीसी हुई यह (द्यौः ऊर्ध्वा) = ऊपर (तस्थौ) = स्थित है । [२] मैं इन पृथिवी व द्युलोक को (विद्वान्) = अच्छी प्रकार समझता हुआ ऋतस्य सद्म ऋत के यज्ञ के गृह में (विचरामि) = विचरण करता हूँ। इस यज्ञ द्वारा पार्थिव पदार्थ द्युलोक में पहुँचते हैं। वहाँ द्युलोक से वर्षा होकर इस पृथ्वी पर अन्न उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह यज्ञ पृथ्वीलोक व द्युलोक के परस्पर सम्बन्ध को स्थापित करनेवाला होता है। पृथ्वी इन नानारूपों का धारण, वृष्टि के अभाव में न कर सकती । न अन्न पैदा होता, न इन प्राणियों का धारण होता । पृथ्वी के पदार्थों के यज्ञों में आहुति न पड़ने पर मेघ-निर्माण की क्रिया ही न हो पाती 'यज्ञाद् भवति पर्जन्यः'। इस प्रकार यज्ञ से परस्पर सम्बद्ध इन (देवानाम्) = पृथ्वीस्थ व द्युलोकस्थ अग्नि, सूर्य आदि देवों का (असुरत्वम्) = प्राणशक्ति-संचार का कार्य (एकम्) = अद्वितीय है और (महत्) = महान् है ।
स्वामी दयानन्द सरस्वती
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हे मनुष्या विद्वानहं यदृतस्य देवानां च महदेकं सद्मासुरत्वं विचरामि तेन नियामिता पद्या रात्रिः सर्वान् वस्ते। अन्या त्र्यविं वपूंषि रेरिहाणोर्ध्वा पुरुरूपोषा तस्थौ तं ते यूयञ्च विजानीत ॥१४॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of Ahoratryou ( day and night) are mentioned.
O men! I (a learned person) move in or know that One Great God Who is the abode of Truth of enlightened men and all divine objects, and is the life-giver. Under His rule, the night (which is a part of 24 hours' time ) covers all. The other exalted one (dawn or day) stands assuming many forms, protecting the effects, causes and souls and licking various forms. You must know all these stages.
