इ॒मं म॒हे वि॑द॒थ्या॑य शू॒षं शश्व॒त्कृत्व॒ ईड्या॑य॒ प्र ज॑भ्रुः। शृ॒णोतु॑ नो॒ दम्ये॑भि॒रनी॑कैः शृ॒णोत्व॒ग्निर्दि॒व्यैरज॑स्रः॥
imam mahe vidathyāya śūṣaṁ śaśvat kṛtva īḍyāya pra jabhruḥ | śṛṇotu no damyebhir anīkaiḥ śṛṇotv agnir divyair ajasraḥ ||
इ॒मम्। म॒हे। वि॒द॒थ्या॑य। शू॒षम्। शश्व॑त्। कृत्वः॑। ईड्या॑य। प्र। ज॒भ्रुः॒। शृ॒णोतु॑। नः॒। दम्ये॑भिः। अनी॑कैः। शृ॒णोतु॑। अ॒ग्निः। दि॒व्यैः। अज॑स्रः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब बाईस ऋचावाले चौवनवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजा के विषय को कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दम्य अनीक व दिव्य ज्ञान
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राजविषयमाह।
हे कृत्वो भवान्महे ईड्याय विदथ्यायेमं शश्वच्छूषं प्र जभ्रुः तान्नोऽस्मान्भवान् दम्येभिरनीकैः सह शृणोतु। अजस्रोऽग्निर्भवान् दिव्यैः कर्मभिः सहाऽस्माञ्छृणोतु ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The duties of the kings are told.
O king! you have many good workers under you. Listen to us who prove our strength and the vigor to be demonstrated on the occasion of the admirable battle. The members of your army should be paid liberally and they combat well. Please listen to us with your divine actions. You are always highly learned and shining like the fire, and are engaged in doing good deeds.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात राजा, विद्वान, प्रजा, अध्यापक, शिष्य, ईश्वर, श्रोता, वक्ता व शूरवीराचे कर्म इत्यादी गुण वर्णन केल्याने या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
