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इन्द्रा॑पर्वता बृह॒ता रथे॑न वा॒मीरिष॒ आ व॑हतं सु॒वीराः॑। वी॒तं ह॒व्यान्य॑ध्व॒रेषु॑ देवा॒ वर्धे॑थां गी॒र्भिरिळ॑या॒ मद॑न्ता॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāparvatā bṛhatā rathena vāmīr iṣa ā vahataṁ suvīrāḥ | vītaṁ havyāny adhvareṣu devā vardhethāṁ gīrbhir iḻayā madantā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑पर्वता। बृ॒ह॒ता। रथे॑न। वा॒मीः। इषः॑। आ। व॒ह॒त॒म्। सु॒ऽवीराः॑। वी॒तम्। ह॒व्यानि॑। अ॒ध्व॒रेषु॑। दे॒वा॒। वर्धे॑थाम्। गीः॒ऽभिः। इळ॑या। मद॑न्ता॥

ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:53» मन्त्र:1 | अष्टक:3» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:3» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब चौबीस ऋचावाले तिरेपनवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजा की सेना के विषय को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सभा और सेना के ईश ! आप दोनों (इन्द्रापर्वता) बिजुली और मेघ के सदृश राज्य सेना के अधीश (बृहता) बड़े (रथेन) वाहन से (सुवीराः) सुन्दर वीर जिनसे उन (वामीः) श्रेष्ठ (इषः) अन्न आदि को (आ, वहतम्) प्राप्त होइये और (अध्वरेषु) नहीं हिंसा करने योग्य यज्ञों में (हव्यानि) देने और ग्रहण करने योग्यों को (वीतम्) प्राप्त होइये और (इळया) सम्पूर्ण शास्त्रों को प्रकाश करनेवाली वाणी से (मदन्ता) कामना करते हुए विद्वान् लोग (देवा) उत्तम सुख देनेवाले होकर (गीर्भिः) उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त वाणियों से (वर्धेथाम्) बढ़ें ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे राजसेनाओं के जन ! जैसे मेघ सम्पूर्ण जलाशय और ओषधियों की रक्षा करता है, वैसे ही सेना के पालन करनेवाले पुरुष बहुत सी सामग्रियों से सम्पूर्ण सेनाओं को भोग से परिपूर्ण करिये और सेना बिजुलियों के सदृश शत्रुओं का नाश करैं और सबमें सब युद्ध और राजविद्या में परिपूर्ण होकर सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त हों ॥१॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ राजसेनाविषयमाह।

अन्वय:

हे सभासेनेशौ ! युवामिन्द्रापर्वतेव बृहता रथेन सुवीरा वामीरिष आ वहतमध्वरेषु हव्यानि वीतमिळया मदन्ता देवा सन्तौ गीर्भिर्वर्द्धेथाम् ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रापर्वता) विद्युन्मेघाविव राज्यसेनाधीशौ (बृहता) महता (रथेन) (वामीः) प्रशस्ताः (इषः) अन्नाद्याः (आ) (वहतम्) प्राप्नुतम्) (सुवीराः) शोभना वीरा याभ्यस्ताः (वीतम्) व्याप्नुतम् (हव्यानि) दातुमादातुमर्हाणि (अध्वरेषु) अहिंसनीयेषु यज्ञेषु (देवा) दिव्यसुखप्रदौ (वर्द्धेथाम्) (गीर्भिः) सुशिक्षिताभिर्वाग्भिः (इळया) सर्वशास्त्रप्रकाशिकया वाचा। इळेति वाङ्ना०। निघं० ३। ५। (मदन्ता) कामयमानौ विद्वांसौ ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे राजसेनाजना ! यथा मेघः सर्वान् जलाशयानोषधीश्च पाति तथैव सेनापालका पुष्कलाभिः सामग्रीभिः सर्वाः अलंभोगाः कुर्य्युः सेनाश्च विद्युद्वच्छत्रून्दहन्तु सर्वेषु सर्वे युद्धराजविद्यावृद्धा भूत्वा सर्वान् कामान् प्राप्नुवन्तु ॥१॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात विद्युत, मेघ, विद्वान, राजा, प्रजा व सेनेच्या कर्माचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - हे राजसेनेतील लोकांनो! जसा मेघ संपूर्ण जलाशय व औषधींचे रक्षण करतो तसेच सेनापालन करणाऱ्या पुरुषांनी पुष्कळ सामग्रीने सर्व सेनेला भोगांनी परिपूर्ण करावे व सेनेने विद्युतप्रमाणे शत्रूंचा नाश करावा. युद्ध व राजविद्येत परिपूर्ण होऊन संपूर्ण मनोरथ पूर्ण करावे. ॥ १ ॥