आ म॒न्द्रैरि॑न्द्र॒ हरि॑भिर्या॒हि म॒यूर॑रोमभिः। मा त्वा॒ के चि॒न्नि य॑म॒न्विं न पा॒शिनोऽति॒ धन्वे॑व॒ ताँ इ॑हि॥
ā mandrair indra haribhir yāhi mayūraromabhiḥ | mā tvā ke cin ni yaman viṁ na pāśino ti dhanveva tām̐ ihi ||
आ। म॒न्द्रैः। इ॒न्द्र॒। हरि॑ऽभिः। या॒हि। म॒यूर॑रोमऽभिः। मा। त्वा॒। के। चि॒त्। नि। य॒म॒न्। विम्। न। पा॒शिनः॑। अति॑। धन्व॑ऽइव। तान्। इ॒हि॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पाँच ऋचावाले पैतालीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विषय-मरुस्थली का उलंघन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ विद्वद्विषयमाह।
हे इन्द्र ! त्वं मयूररोमभिर्मन्द्रैर्हरिभिरायाहि यतः केचित्त्वा पाशिनो विं न मा नियमन् धन्वेव तानतीहि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes and duties of the enlightened persons are told.
O prosperous king ! come to us with your pleasing horses of peacock like color hairs, (they are like sturdy and strong persons or the rays of the sun). Let not persons detain you, like the fowlers catching a bird. You pass by them quickly, as arrows and other arms pass by (removing the obstructions).
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात सूर्य, विद्वान व राजाच्या गुणाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
