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होता॑ दे॒वो अम॑र्त्यः पु॒रस्ता॑देति मा॒यया॑। वि॒दथा॑नि प्रचो॒दय॑न्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hotā devo amartyaḥ purastād eti māyayā | vidathāni pracodayan ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

होता॑। दे॒वः। अम॑र्त्यः। पु॒रस्ता॑त्। ए॒ति॒। मा॒यया॑। वि॒दथा॑नि। प्र॒ऽचो॒दय॑न्॥

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ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:27» मन्त्र:7 | अष्टक:3» अध्याय:1» वर्ग:29» मन्त्र:2 | मण्डल:3» अनुवाक:2» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर विद्यार्थी क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे धर्म आदि को जानने की इच्छा करनेवाले पुरुषो ! जैसे (अमर्त्यः) मरणधर्म से रहित (होता) देनेवाला (देवः) उत्तम गुण कर्म स्वभावयुक्त पुरुष (पुरस्तात्) पहिले से (मायया) उत्तम बुद्धि के साथ (विदथानि) विज्ञानों का (प्रचोदयन्) प्रचार करता हुआ आप लोगों को (एति) प्राप्त होता है, वैसे उसको आप लोग भी प्राप्त होइये ॥७॥
भावार्थभाषाः - हे विद्यार्थी जनो ! जो अध्यापक पुरुष आप लोगों के लिये कपट त्याग के विद्या आदि उत्तम गुणों को देकर उत्तम शिक्षा देवे, उसकी आप लोग भी अपने आत्मा के तुल्य सेवा करो ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रक्षण का प्रकार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वे प्रभु (होता) = हमारे लिए सब आवश्यक पदार्थों को देनेवाले हैं। (देवः) = प्रकाशमय हैंहमारे जीवनों को प्रकाशमय बनाते हैं। आवश्यक पदार्थों को प्राप्त कराके तथा प्रकाश देकर (अमर्त्यः) = वे प्रभु हमें मृत्यु से बचाते हैं। [२] वे प्रभु (मायया) = ज्ञान के साथ (पुरस्ताद् एति) = हमारे सामने आते हैं और (विदथानि) = ज्ञानों को (प्रचोदयन्) = हमारे अन्त:करणों में प्रेरित करते हैं। वस्तुतः इन ज्ञान की प्रेरणाओं से ही ठीक मार्ग को दिखलाते हुए वे हमारा रक्षण करते हैं। पदार्थ व प्रकाश को प्राप्त कराते हैं। हमारे अन्तःकरणों में ज्ञान
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें आवश्यक को प्रेरित करते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्विद्यार्थिनः किं कुर्युरित्याह।

अन्वय:

हे जिज्ञासवो यथाऽमर्त्यो होता देवः पुरस्तान्मायया सह विदथानि प्रचोदयन् युष्मानेति तथैतं यूयमपि प्राप्नुत ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (होता) दाता (देवः) दिव्यगुणकर्मस्वभावः (अमर्त्यः) मरणधर्मरहितः (पुरस्तात्) प्रथमतः (एति) गच्छति (मायया) प्रज्ञया (विदथानि) विज्ञानानि (प्रचोदयन्) प्रज्ञापयन् ॥७॥
भावार्थभाषाः - हे विद्यार्थिनो योऽध्यापको युष्मभ्यं निष्कपटतया विद्यादिशुभगुणान् प्रदाय सुशिक्षयेत्तं यूयमप्यात्मवत्सेवध्वम् ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The brilliant performers of yajna, immortal and indestructible, goes forward with his innate power and intelligence, inspiring, advancing and accelerating yajnic programmes of creative and productive corporate action.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे विद्यार्थ्यांनो! जे अध्यापक तुमच्यासाठी कपटाचा त्याग करून विद्या इत्यादी उत्तम गुणांना देऊन सुशिक्षण देतात त्याची तुम्ही आपल्या आत्म्याप्रमाणे सेवा करा. ॥ ७ ॥