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अ॒ग्निं य॒न्तुर॑म॒प्तुर॑मृ॒तस्य॒ योगे॑ व॒नुषः॑। विप्रा॒ वाजैः॒ समि॑न्धते॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agniṁ yanturam apturam ṛtasya yoge vanuṣaḥ | viprā vājaiḥ sam indhate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निम्। य॒न्तुर॑म्। अ॒प्ऽतुर॑म्। ऋ॒तस्य॑। योगे॑। व॒नुषः॑। विप्राः॑। वाजैः॑। सम्। इ॒न्ध॒ते॒॥

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ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:27» मन्त्र:11 | अष्टक:3» अध्याय:1» वर्ग:30» मन्त्र:1 | मण्डल:3» अनुवाक:2» मन्त्र:11


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे (वनुषः) याचना करनेवाले (विप्राः) बुद्धिमान् जन (ऋतस्य) सत्य के (योगे) योग में (वाजैः) विज्ञान आदिकों से (यन्तुरम्) प्राप्तिकारक (अप्तुरम्) प्राण वा जलों की प्रेरणाकर्त्ता (अग्निम्) अग्नि के सदृश तेजस्वी को (सम्) (इन्धते) उत्तम प्रकार प्रदीप्त करें, वैसे ही सम्पूर्ण जनों से विद्या प्रकाश करने योग्य है ॥११॥
भावार्थभाषाः - जिस समय विद्वान् पुरुषों का सङ्ग होवे, उस समय उत्तम विज्ञान ही की प्रश्न-उत्तरों से याचना करनी चाहिये, इससे अधिक लाभ और न समझना चाहिये ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यन्तुरं व अप्सुरम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अग्निम्) = उस अग्रणी प्रभु को, जो कि (यन्तुरम्) = सब के नियामक हैं- सब सूर्य-चन्द्रतारों तथा पृथिवी आदि के अन्तः स्थित हुए हुए उनका धारण व नियमन कर रहे हैं। जो (अप्तुरम्) = सब को कर्मों में प्रेरित करनेवाले हैं - हृदयस्थरूपेण सदा कर्मों की वे प्रभु प्रेरणा दे रहे हैं। इन प्रभु को (अमृतस्य योगे) = अमृतत्त्व व नीरोगता का सम्पर्क होने पर (वाजैः) = शक्तियों द्वारा (वनुषः) = काम-क्रोधादि को जीतनेवाले (विप्राः) = ज्ञानीपुरुष (समिन्धते) = अपने में समिद्ध करते हैं। [२] प्राकृतिक संसार के दृष्टिकोण से प्रभु 'यन्तुर' हैं, जीवों के दृष्टिकोण से 'अतुर' हैं । प्रकृति पूर्ण परत का है, सो सूर्यादि की गति में किसी प्रकार की गलती नहीं होती। जीव को प्रभु ने कर्म करने की स्वतन्त्रता दी है। प्रभु प्रेरणा देते हैं। यदि जीव सुनकर उसके अनुसार कार्य करता है तो ठीक होता है। नहीं सुनता और मनमाना चलता है तो कष्ट पाता है। [३] इस प्रभु को पाने के लिए आवश्यक है कि हम [क] नीरोग बनें [अमृतस्य योगे], [ख] शक्ति का सम्पादन करें [वाजैः], [ग] काम-क्रोधादि को अभिभूत करें [वनुष:] तथा [घ] ज्ञानी बनें [विप्राः] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु प्रकृति के नियामक हैं, जीव के प्रेरक हैं। प्रभुप्राप्ति के लिए 'नीरोगता, काम आदि का अभिभव, ज्ञान व शक्ति का सम्पादन' साधन हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

हे मनुष्या यथा वनुषो विप्रा ऋतस्य योगे वाजैर्यन्तुरमप्तुरमग्निं समिन्धते तथैव सर्वैर्विद्याः प्रकाशनीयाः ॥११॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निम्) पावकमिव वर्त्तमानम् (यन्तुरम्) यन्तारम्। अत्र यमधातोर्बाहुलकात्तुरः प्रत्ययः। (अप्तुरम्) योऽपः प्राणान् जलानि वा तोरयति प्रेरयति तम् (ऋतस्य) सत्यस्य (योगे) (वनुषः) याचकाः (विप्राः) मेधाविनः (वाजैः) विज्ञानादिभिः (सम्) (इन्धते) सम्यक् प्रदीपयेयुः ॥११॥
भावार्थभाषाः - यदा विदुषां सङ्गो भवेत्तदा सुविज्ञानस्यैव प्रश्नसमाधानाभ्यां याचना कार्य्या, अस्मात्परो लाभोऽन्यो नैव मन्तव्यः ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Intelligent and dynamic people with the desire to accomplish their objects of life light and raise Agni, instant and inspiring moving power, in their yajnic applications, in order to achieve their practical programmes in the pursuit of science and Truth with the best offerings of food and fuels for energy.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The characteristics of the enlightened persons.

अन्वय:

O men! the wise persons implore wisdom with truth. They actuate lit kindle knowledge and humility etc. An enlightened person is controller of his senses, is impeller of his Pranas or waters and is purifier like the fire. In the same manner, various sciences should be discovered and demonstrated to all.

भावार्थभाषाः - When someone comes in association with the enlightened persons, they should be requested to impart true knowledge by removing all doubts. Men should know that there is no greater gain than this.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्यावेळी विद्वान पुरुषांचा संग होतो, त्यावेळी उत्तम विज्ञानाची प्रश्नोत्तररूपाने याचना केली पाहिजे. यापेक्षा कोणताही अधिक लाभ नाही हे समजावे. ॥ ११ ॥