प्र वो॒ वाजा॑ अ॒भिद्य॑वो ह॒विष्म॑न्तो घृ॒ताच्या॑। दे॒वाञ्जि॑गाति सुम्न॒युः॥
pra vo vājā abhidyavo haviṣmanto ghṛtācyā | devāñ jigāti sumnayuḥ ||
प्र। वः॒। वाजाः॑। अ॒भिऽद्य॑वः। ह॒विष्म॑न्तः। घृ॒ताच्या॑। दे॒वान्। जि॒गा॒ति॒। सु॒म्न॒युः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पन्द्रह ऋचावाले सत्ताईसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र से विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
शक्ति, ज्ञान व त्याग
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ विद्वद्भिः किं कार्यमित्याह।
हे मनुष्यो ये वोऽभिद्यवो हविष्मन्तो वाजा घृताच्या सह वर्त्तन्ते तैर्युक्तो यः सुम्नयुर्देवान् प्रजिगाति तांस्तं च यूयं प्राप्नुत ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should the enlightened persons do is told.
O men! you should approach the person who is desirous of attaining true happiness, is blessed with knowledge and other qualities shining from all sides. It possess many worth-giving articles for the one, who sits for meditation at night and glorifies God.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नी व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्तात सांगितलेल्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
