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निर्म॑थितः॒ सुधि॑त॒ आ स॒धस्थे॒ युवा॑ क॒विर॑ध्व॒रस्य॑ प्रणे॒ता। जूर्य॑त्स्व॒ग्निर॒जरो॒ वने॒ष्वत्रा॑ दधे अ॒मृतं॑ जा॒तवे॑दाः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nirmathitaḥ sudhita ā sadhasthe yuvā kavir adhvarasya praṇetā | jūryatsv agnir ajaro vaneṣv atrā dadhe amṛtaṁ jātavedāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

निःऽम॑थितः। सुऽधि॑तः। आ। स॒धऽस्थे॑। युवा॑। क॒विः। अ॒ध्व॒रस्य॑। प्र॒ऽने॒ता। जूर्य॑त्ऽसु। अ॒ग्निः। अ॒जरः॑। वने॑षु। अत्र॑। द॒धे॒। अ॒मृत॑म्। जा॒तऽवे॑दाः॥

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ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:23» मन्त्र:1 | अष्टक:3» अध्याय:1» वर्ग:23» मन्त्र:1 | मण्डल:3» अनुवाक:2» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब पाँच ऋचावाले तेईसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र से अग्नि के द्वारा शिल्पविद्या का उपदेश किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जो (सधस्थे) तुल्य स्थान में (निर्मथितः) अत्यन्त मथा अर्थात् प्रदीप्त किया गया (सुधितः) उत्तम प्रकार धारित (युवा) विभागकर्त्ता (कविः) उत्तम दर्शन सहित (प्रणेता) प्रेरणाकारक (अजरः) नित्य (जातवेदाः) धनों की उत्पत्ति करनेवाला (अग्निः) अग्नि (जूर्यत्सु) वेगयुक्त (वनेषु) किरणों में (अध्वरस्य) अहिंसारूप शिल्पव्यवहार को (आदधे) धारण करता है (अत्र) इस शिल्पविद्या में (अमृतम्) जल को भी धारण करता, वह अग्नि सम्पूर्ण उपायों से जानने योग्य है ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! कलायन्त्र आदिकों से युक्त वाहनों में अत्यन्त मथित होकर चलाया गया अग्नि सकल जनों के लिये वाहनों को वेगपूर्वक चलाता है, यह जानना चाहिये ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अमृतत्त्व का धारण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अत्रा) = यहाँ इस संसार में (जातवेदा:) = वे सर्वज्ञ प्रभु (वनेषु) = उपासकों में (अमृतम्) = अमृतत्त्व को (दधे) = धारण करते हैं। उपासकों को प्रभु जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठाकर अमरता प्राप्त कराते हैं। वे प्रभु जो कि (जूर्यत्सु अजर:) = [विनश्यत्सु अविनश्यन्तम्] जीर्ण होनेवाले पदार्थों में अजर हैं-कभी जीर्ण होनेवाले नहीं। (अग्नि:) = अग्रणी हैं, सब से अग्र स्थान में स्थित हैं, हमें उन्नतिपथ पर ले चलते हैं । [२] ये हमें उन्नतिपथ पर तब ले चलते हैं, जब कि (निर्मथितः) = ज्ञान व श्रद्धा रूप अरणियों की रगड़ द्वारा प्रकट किए जाते हैं। 'ध्यान निर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत्' ध्यानरूप रगड़ द्वारा प्रभु का मन्थन होता है। इस रगड़ द्वारा ही वे प्रभु (सधस्थे) = जीव व प्रभु के साथ-साथ ठहरने के स्थान हृदय में (आसुधित:) = सर्वथा उत्तमता से स्थापित होते हैं। हृदयस्थ होकर ये प्रभु ‘युवा’=हमें बुराइयों से पृथक् करनेवाले तथा अच्छाइयों से मिलानेवाले हैं। बुराइयों से दूर करने के लिए ही (कविः) ='कौति सर्वाः विद्याः' सब ज्ञानों को देनेवाले हैं और ज्ञान देकर (अध्वरस्य प्रणेता) = यज्ञों का प्रणयन करनेवाले हैं- प्रभु हमें यज्ञों के मार्ग पर ले चलते हैं। ये यज्ञ ही हमारे अमृतत्त्व का कारण बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- अजर प्रभु उपासकों को भी अजर बनाते हैं।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्निद्वाराशिल्पविद्योपदिश्यते।

अन्वय:

हे मनुष्या यस्सधस्थे निर्मथितः सुधितो युवा कविः प्रणेताऽजरो जातवेदा अग्निर्जूर्यत्सु वनेष्वध्वरस्या दधेऽत्रामृतं च स सर्वोपायैर्वेदितव्यः ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (निर्मथितः) नितरां विलोडितः (सुधितः) सुष्ठु धृतः (आ) (सधस्थे) समानस्थाने (युवा) विभाजकः (कविः) क्रान्तदर्शनः (अध्वरस्य) अहिंसामयस्य शिल्पव्यवहारस्य (प्रणेता) प्रेरकः (जूर्यत्सु) वेगवत्सु (अग्निः) पावकः (अजरः) नित्यः (वनेषु) रश्मिषु (अत्र) अस्मिन्। अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (दधे) दधाति (अमृतम्) उदकम् (जातवेदाः) जातानि वेदांसि धनानि यस्मात्सः ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्याः कलायन्त्रादियुक्तेषु यानेषु नितरां विलोडितश्चालितोऽग्निः सर्वेभ्यो यानानि वेगेन गमयतीति वित्त ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Well produced by friction, well kindled and well managed in the home of yajna, Agni, jataveda, treasure house of wealth, youthful and unaging, catalytic creative light, leader of yajna, visionary maker, may, we pray, on the velocity of light rays, bear and bring nectar-like vitality and energy and sustain our yajnic programme of love and creative production.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The science and technology of Agni (energy) is taught.

अन्वय:

That Agni (fire energy) should be known by all means, which is kindled at the levelled place with the fire-wood sticks, or otherwise duly placed (harnessed) in the machines etc. It disjoints the things, which are seen even from a distance, is impeller, imperishable and bringer of much wealth (when properly utilized). In its speedy rays uphold various technical dealings, and it plays amidst consuming forests. This fire upholds water (for accomplishing various works).

भावार्थभाषाः - O men ! you should know that fire (energy) when it is used in the vehicles with various machines, and in this way it is generated which helps in driving and moving of the vehicles speedily.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात अग्नी व विद्वान माणसांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.

भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! कलायंत्र इत्यादींनी युक्त वाहनांमध्ये अत्यंत मंथन (प्रदीप्त) करून निघालेला अग्नी सर्व लोकांसाठी वाहनांना वेगाने चालवितो, हे जाणले पाहिजे. ॥ १ ॥