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न॒म॒स्यत॑ ह॒व्यदा॑तिं स्वध्व॒रं दु॑व॒स्यत॒ दम्यं॑ जा॒तवे॑दसम्। र॒थीर्ऋ॒तस्य॑ बृह॒तो विच॑र्षणिर॒ग्निर्दे॒वाना॑मभवत्पु॒रोहि॑तः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

namasyata havyadātiṁ svadhvaraṁ duvasyata damyaṁ jātavedasam | rathīr ṛtasya bṛhato vicarṣaṇir agnir devānām abhavat purohitaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न॒म॒स्यत॑। ह॒व्यऽदा॑तिम्। सु॒ऽअ॒ध्व॒रम्। दु॒व॒स्यत॑। दम्य॑म्। जा॒तऽवे॑दसम्। र॒थीः। ऋ॒तस्य॑। बृ॒ह॒तः। विऽच॑र्षणिः। अ॒ग्निः। दे॒वाना॑म्। अ॒भ॒व॒त्। पु॒रःऽहि॑तः॥

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ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:2» मन्त्र:8 | अष्टक:2» अध्याय:8» वर्ग:18» मन्त्र:3 | मण्डल:3» अनुवाक:1» मन्त्र:8


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वानो ! जो (रथीः) प्रशंसित रथवान् (ऋतस्य) सत्य (बृहतः) बड़े कार्य का (विचर्षणिः) देखनेवाला (देवानाम्) विद्वानों का (पुरोहितः) पहिले जिसको धारण करते (अग्निः) पवित्र करनेवाला (अभवत्) होता है और (हव्यदातिम्) होमने योग्य पदार्थों का देनेवाला (स्वध्वरम्) जिससे कि सुन्दर यज्ञ होता उस (दम्यम्) दानशील (जातवेदसम्) और उत्पन्न हुए पदार्थों से विद्यमान विद्वान् को (नमस्यत) नमस्कार करो और उसकी (दुवस्यत) सेवा करो ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जो बहुत विद्यावाला अहिंसक, जितेन्द्रिय, विद्वानों के बीच विद्वान् हो, वही तुम लोगों को नमस्कार करने और सेवने योग्य भी हो ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वह महान् पुरोहित

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (हव्यदातिम्) = सब हव्य पदार्थों के देनेवाले, (स्वध्वरम्) = उत्तम यज्ञोंवाले प्रभु को (नमस्यत) = प्रातः-सायं नमन करनेवाले बनो। प्रभु सब उत्कृष्ट पदार्थों को हमें प्राप्त कराते हैं। सब आवश्यक हव्यों को प्राप्त कराके वे हमारे सब यज्ञों को पूर्ण किया करते हैं। (दम्यम्) = [दमेभ्यो हितं] सब गृहों के लिये हितकर (जातवेदसम्) = उस सर्वज्ञ व सब धनोंवाले प्रभु को (दुवस्यत) = तुम पूजो। जिस घर में प्रभु-पूजन सम्मिलित रूप से होता रहता है, वह घर उत्तम वृत्तिवाला बनकर सदा ठीक बना रहता है और किसी प्रकार के आवश्यक धन की कमी नहीं रहती। [२] वे प्रभु, जिनका नमन व पूजन हमें गृहों में करना है, (बृहतः ऋतस्य) = महान् ऋत के (रथी:) = प्रणेता हैं। प्रभु के शासन में प्रत्येक प्राकृतिक पिण्ड व लोक बड़ी नियमित गति से चल रहा है। प्रकृति के इन नियमों को ही 'ऋत' कहते हैं। अनन्त लोक-लोकान्तर इस ऋत के अनुसार अपने-अपने मार्ग पर चल रहे हैं। (विचर्षणिः) = वे प्रभु विशेषरूप से हमारे ब्रह्माण्ड के द्रष्टा हैं, अध्यक्ष हैं, प्रभु की अध्यक्षता में यह सारा ब्रह्माण्ड यन्त्र घूम रहा है। (अग्निः) = वे ही अग्रणी हैं, सबको आगे ले चल रहे हैं। [३] (देवानां पुरोहितः अभवत्) = देवों के वे पुरोहित हैं। देववृत्ति के लोगों के लिये वे आदर्श के रूप में हैं। उनके सामने [पुर:] विद्यमान हैं [हितः] । प्रभु को देखकर देव भी वैसा बनने का प्रयत्न करते हैं। प्रभु अनन्त दयालु हैं, ये भी दया को अपनाते हैं। प्रभु न्यायकारी हैं, ये भी न्याय को अपनाने के लिये यत्नशील होते हैं। इस प्रकार ये देव भी परमात्मा के गुणों को धारण करने का प्रयत्न करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का हम उपासन करें, प्रभु जैसा बनने का प्रयत्न करें।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ विद्वद्विषयमाह।

अन्वय:

हे विद्वांसो यो रथीर्ऋतस्य बृहतो विचर्षणिर्देवानां पुरोहितोऽग्निरभवत्तं हव्यदातिं स्वध्वरं दम्यं जातवेदसं नमस्यत दुवस्यत च ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (नमस्यत) (हव्यदातिम्) हव्यानां दातिर्दानं येन तम् (स्वध्वरम्) शोभनोऽध्वरो यस्मात्तम् (दुवस्यत) सेवध्वम् (दम्यम्) दातुं शीलम् (जातवेदसम्) जातेषु विद्यमानम् (रथीः) प्रशस्तरथवान् (ऋतस्य) सत्यस्य (बृहतः) महतः कार्यस्य (विचर्षणिः) पश्यकः (अग्निः) पावकः (देवानाम्) विदुषाम् (अभवत्) भवति (पुरोहितः) पुर एनं दधति सः ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या यो बृहद्विद्योऽहिंसको जितेन्द्रियः प्रशंसितो विदुषां मध्ये विद्वान् भवेत् स एव युष्माभिर्नमस्करणीयः सेवनीयश्च स्यात् ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Offer salutations and service in homage to Agni. Creator of food for yajna and enjoyment, leader of yajna to success, supreme giver, knower of all that is born, omnipresent lord ever on the move, watching and superintending the universal operation of law and yajna, Agni is the foremost high-priest of the dynamics of Divinity working through the forces of nature.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of a highly learned person.

अन्वय:

O learned persons! revere and serve him who is the master of good chariot or body and is the observer and seer of great truth. He is also the leader of the enlightened persons, and is the liberal giver of acceptable knowledge and articles, He is performer of good Yajnas and he gives knowledge of all that exists.

भावार्थभाषाः - O men ! great scholars should be revered and served by you who is non-violent man of self abnegation and highly admired in the circle of the enlightened persons.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! जो विद्यावान, अहिंसक, जितेन्द्रिय, विद्वानांमध्ये विद्वान असेल त्यालाच तुम्ही वंदनीय व आदरणीय समजा. ॥ ८ ॥