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तपो॒ ष्व॑ग्ने॒ अन्त॑राँ अ॒मित्रा॒न् तपा॒ शंस॒मर॑रुषः॒ पर॑स्य। तपो॑ वसो चिकिता॒नो अ॒चित्ता॒न्वि ते॑ तिष्ठन्ताम॒जरा॑ अ॒यासः॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tapo ṣv agne antarām̐ amitrān tapā śaṁsam araruṣaḥ parasya | tapo vaso cikitāno acittān vi te tiṣṭhantām ajarā ayāsaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तपो॒ इति॑। सु। अ॒ग्ने॒। अन्त॑रान्। अ॒मित्रा॑न्। तप॑। शंस॑म्। अर॑रुषः। पर॑स्य। तपो॒ इति॑। व॒सो॒ इति॑। चि॒कि॒ता॒नः। अ॒चित्ता॑न्। वि। ते॒। ति॒ष्ठ॒न्ता॒म्। अ॒जराः॑। अ॒यासः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:18» मन्त्र:2 | अष्टक:3» अध्याय:1» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:3» अनुवाक:2» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (तपो) तपस्वी ! (अग्ने) दुष्टजनों के अग्नि के सदृश दाहकर्त्ता आप (अन्तरान्) भेद को प्राप्त (अमित्रान्) शत्रुओं को (सुतप) सन्तापयुक्त तथा (अररुषः) अहिंसायुक्त (परस्य) श्रेष्ठजन की (शंसम्) प्रशंसा करो हे (तपो) दुष्ट पुरुषों के दाहकारी (वसो) उत्तम गुणों में निवासी (चिकितानः) ज्ञानवान् वा बोधकारक आप (अचित्तान्) दरिद्र दशायुक्त पुरुषों को सचेत कीजिये और ये (अजराः) वृद्धावस्था रूप रोग से रहित (अयासः) विज्ञानयुक्त पुरुष (ते) आपके समीप (वि) (तिष्ठन्ताम्) वर्त्तमान हों ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य शत्रुओं को पृथक् कर धार्मिक यथार्थवक्ता सत्यवादी पुरुषों का सत्कार करके सब जनों के लिये सुखवृद्धि करते हैं, वे भी सुख पाते हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शत्रु- दहन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन्! (अन्तरान् अमित्रान्) = अन्दर के शत्रुओं को- काम-क्रोध-लोभ को (उ) = निश्चय से (सु तप) = अच्छी तरह दग्ध कर दीजिए। [२] (अररुष:) = दान की वृत्ति से शून्य (परस्य) = शत्रु के (शंसम्) = अशुभ के शंसन को (तप) = [क्षपय] नष्ट करिए। ये जो अशुभ को शुभ के रूप में चित्रित करें तो हम उनकी बातों में न आ जाएँ। [३] हे (वसो) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले प्रभो ! (चिकितानः) = सर्वज्ञ व हमारी चिकित्सा करनेवाले होते हुए आप (अचित्तान्) = अज्ञानियों को तप उ निश्चय से दग्ध करिए। हमारे लिए (ते) = आपके (अजरा:) = जीर्णता को न उत्पन्न करनेवाले (अयासः) = गमन व कार्य (वितिष्ठन्ताम्) = विशेषरूप से स्थित हों, अर्थात् प्रभु का प्रत्येक कार्य हमें अजर बनानेवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारे शत्रुओं को दग्ध करें। प्रभु की प्रत्येक क्रिया हमें अजीर्ण करनेवाली हो ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

हे तपोऽग्ने त्वमन्तरानमित्रान्सुतप। अररुषः परस्य शंसं विधेहि। हे तपो वसो चिकितानस्त्वमचित्तान् बोधय। एतेऽजरा अयासस्ते समीपे वितिष्ठन्ताम् ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (तपो) तपस्विन् (सु) (अग्ने) दुष्टान्प्रतिपावकवद्वर्त्तमान (अन्तरान्) भिन्नान् (अमित्रान्) शत्रून् (तप) सन्तापय (शंसम्) प्रशंसाम् (अररुषः) अहिंसकस्य (परस्य) श्रेष्ठस्य (तपो) दुष्टानां पुरुषाणां दाहक (वसो) यस्सद्गुणेषु वसति तत्सम्बुद्धौ (चिकितानः) ज्ञानवान् ज्ञापकः (अचित्तान्) प्राप्तदरिद्रावस्थान् (वि) (ते) तव (तिष्ठन्ताम्) (अजराः) जरारोगरहिताः (अयासः) विज्ञानवन्तः ॥२॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्याः शत्रून्निवार्य्य धार्मिकानाप्तान्सत्कृत्य सर्वार्थं सुखं वर्द्धयन्ति तेऽपि सुखमाप्नुवन्ति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, bright and blazing lord of discipline and austerity, burn off the enemies within, season and purify the praise and appreciation of the non-violent devotee of higher order. O scorcher of evil and shelter of the good, lord of light and knowledge, arouse the unaware and ignorant, and may your dynamic yajakas live a long age strong and youthful.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The behavior and appearances of the enlightened persons.

अन्वय:

O ascetic ! O eradicators of the evils like the fire ! give punishment to those who are wicked foes, but always admire a person who is noble and non-violent. O burner of the wicked and virtuous leader! being blessed with true knowledge, you instruct those who are devoid of that knowledge and are therefore in a degraded condition. May the enlightened persons who are free from premature old age and diseases be close to you.

भावार्थभाषाः - Those persons who keep the foes at distance and honor the righteous absolutely truthful persons, they provide happiness for all and also enjoy happiness themselves.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे शत्रूंना पृथक करून धार्मिक यथार्थ वक्ता सत्यवादी पुरुषांचा सत्कार करून सर्व लोकांसाठी सुखवृद्धी करतात तीही सुख प्राप्त करतात. ॥ २ ॥