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परि॒ विश्वा॑नि॒ सुधि॑ता॒ग्नेर॑श्याम॒ मन्म॑भिः। विप्रा॑सो जा॒तवे॑दसः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pari viśvāni sudhitāgner aśyāma manmabhiḥ | viprāso jātavedasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑। विश्वा॑नि। सुऽधि॑ता। अ॒ग्नेः। अ॒श्या॒म॒। मन्म॑ऽभिः। विप्रा॑सः। जा॒तऽवे॑दसः॥

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ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:11» मन्त्र:8 | अष्टक:3» अध्याय:1» वर्ग:10» मन्त्र:3 | मण्डल:3» अनुवाक:1» मन्त्र:8


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे (जातवेदसः) विद्वान् हुए (विप्रासः) बुद्धिमान् हम लोग (मन्मभिः) विज्ञान विशेषों के सहित (अग्नेः) अग्नि के सदृश (विश्वानि) सम्पूर्ण (सुधिता) उत्तम प्रकार धारण किये शास्त्रों को (परि) सब ओर से (अश्याम) प्राप्त हों, वैसे ही आप लोग भी प्राप्त हूजिये ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि जैसे बुद्धिमान् विद्वान् सृष्टि और आत्मा की विद्या ग्रहण के लिये प्रयत्न करते हैं, वैसे ही विद्यावृद्धि के लिये प्रयत्न करें ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्तम हितकर वस्तुओं की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम (अग्नेः मन्मभिः) = उस प्रभु के मनन व स्तोत्रों द्वारा (विश्वानि) = सब सुधिता उत्तम हितकर वस्तुओं को (परिअश्याम) = प्राप्त करें। जितना जितना हम ज्ञान प्राप्त करते हैं और प्रभुस्मरण करनेवाले होते हैं, उतना उतना ही उत्तम हितकर वस्तुओं को प्राप्त करते हैं। [२] इन वस्तुओं द्वारा, इनके ठीक प्रयोग द्वारा हम (विप्रासः) = अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले होते हैं [वि+प्रा पूरणे] और (जातवेदसः) = ज्ञानी बन पाते हैं। इस ठीक प्रयोग से हमारे शरीरों में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं होती और हमारे मस्तिष्क ज्ञान से उज्ज्वल होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का उपासक उत्तम हितकर वस्तुओं को प्राप्त करता है। उनके ठीक प्रयोग से यह शक्ति सम्पन्न व ज्ञानी बनता है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

हे मनुष्या यथा जातवेदसो विप्रासो वयं मन्मभिरग्नेर्विश्वानि सुधिता पर्यश्याम तथैव यूयमपि प्राप्नुत ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (परि) सर्वतः (विश्वानि) सर्वाणि (सुधिता) सुष्ठु धृतानि (अग्नेः) पावकस्येव (अश्याम) प्राप्नुयाम (मन्मभिः) विज्ञानविशेषैः सह (विप्रासः) मेधाविनः (जातवेदसः) जातविद्या विद्वांसः सन्तः ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वद्भिर्मनुष्यैर्यथा मेधाविनो सृष्ट्यात्मनोर्विद्याग्रहणाय प्रयतन्ते तथैव विद्योन्नतये प्रयतितव्यम् ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May we, inspired and enlightened yajakas, with sincere prayers, worship and do yajna to get all the benevolent and gracious gifts of Agni, lord omniscient of existence.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of learned persons still runs.

अन्वय:

Being endowed with intelligence and knowledge, we obtain by special scientific knowledge and attributes of an enlightened person. He is indeed, purifier like the fire, so you should also do.

भावार्थभाषाः - The wise enlightened men try to acquire the knowledge of God and soul and the world. Likewise, you should also endeavor for the development of your knowledge.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जसे बुद्धिमान विद्वान सृष्टी व आत्म्याची विद्या ग्रहण करण्यासाठी प्रयत्न करतात तसा विद्वान माणसांनी विद्या बुद्धीसाठी प्रयत्न करावा. ॥ ८ ॥