अ॒भि प्रयां॑सि॒ वाह॑सा दा॒श्वाँ अ॑श्नोति॒ मर्त्यः॑। क्षयं॑ पाव॒कशो॑चिषः॥
abhi prayāṁsi vāhasā dāśvām̐ aśnoti martyaḥ | kṣayam pāvakaśociṣaḥ ||
अ॒भि। प्रयां॑सि। वाह॑सा। दा॒श्वान्। अ॒श्नो॒ति॒। मर्त्यः॑। क्षय॑म्। पा॒व॒कऽशो॑चिषः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
युक्ताहार-विहार व प्रभुप्राप्ति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह।
यो दाश्वान्मर्त्यो पावकशोचिषः क्षयमश्नोति स वाहसा प्रयांस्यभ्यश्नोति ॥७॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The learned persons' duties are enumerated.
When a donor or a man entirely devoted to all, reaches the abode of a person of fire-like purifying radiance, he gets all desirable edibles, as conveyed to him by the preceptor.
