त्वाम॑ग्ने मनी॒षिणः॑ स॒म्राजं॑ चर्षणी॒नाम्। दे॒वं मर्ता॑स इन्धते॒ सम॑ध्व॒रे॥
tvām agne manīṣiṇaḥ samrājaṁ carṣaṇīnām | devam martāsa indhate sam adhvare ||
त्वाम्। अ॒ग्ने॒। म॒नी॒षिणः॑। स॒म्ऽराज॑म्। च॒र्ष॒णी॒नाम्। दे॒वम्। मर्ता॑सः। इ॒न्ध॒ते॒। सम्। अ॒ध्व॒रे॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब नौ ऋचावाले दशमें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में ईश्वर क्या करता है, इस विषय को कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मनीषियों को प्रभुदर्शन
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथेश्वरः किं करोतीत्याह।
हे अग्ने जगदीश्वर ! मनीषिणो मर्त्तासो यं चर्षणीनां सम्राजं देवं त्वामध्वरे समिन्धते तमेव वयमप्युपासीमहि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The performance of God is described.
O God ! you illuminate like Agni (fire or sun), We meditate upon and communicate with you whom men of self-control kindle or illuminate in Yajnas (non-violent sacrifices and other noble philanthropic deeds). You are sovereign of men and other beings and Giver of all happiness.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नी, परमात्मा व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
