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यं त्वा॑ दे॒वापि॑: शुशुचा॒नो अ॑ग्न आर्ष्टिषे॒णो म॑नु॒ष्य॑: समी॒धे । विश्वे॑भिर्दे॒वैर॑नुम॒द्यमा॑न॒: प्र प॒र्जन्य॑मीरया वृष्टि॒मन्त॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaṁ tvā devāpiḥ śuśucāno agna ārṣṭiṣeṇo manuṣyaḥ samīdhe | viśvebhir devair anumadyamānaḥ pra parjanyam īrayā vṛṣṭimantam ||

पद पाठ

यम् । त्वा॒ । दे॒वऽआ॑पिः । शु॒शु॒चा॒नः । अ॒ग्ने॒ । आ॒र्ष्टि॒षे॒णः । म॒नु॒ष्यः॑ । स॒म्ऽई॒धे । विश्वे॑भिः । दे॒वैः । अ॒नु॒ऽम॒द्यमा॑नः । प्र । प॒र्जन्य॑म् । ई॒र॒य॒ । वृ॒ष्टि॒ऽमन्त॑म् ॥ १०.९८.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:98» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:13» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक राजन् ! (यत्) जब (आर्ष्टिषेणः-देवापिः) ज्ञानशक्तिसेनासम्पन्न का रक्षक पुरोहित विद्वान् मननशील (त्वा समीधे) तुझे तेजस्वी करता है-बनाता है (विश्वेभिः) सब (देवैः) वैज्ञानिकों के साथ (अनुमद्यमानः) अनुकूल मति प्राप्त करता हुआ (वृष्टिमन्तम्) वृष्टिवाले (पर्जन्यम्) मेघ को (प्र-ईरय) प्रेरित करता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - ज्ञान और शस्त्रास्त्रशक्तिसम्पन्न विद्वान् पुरोहित राजा को जैसे तेजस्वी बनाता है, ऐसे ही समस्त विद्वानों की सहमति से वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा राष्ट्र में जलवृष्टि करनेवाले मेघ को नीचे प्रेरित कर लेता है ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शुशुचान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (यं त्वा) = जिन आपको (देवापिः) = देवों को मित्र बनानेवाला, (शुशुचानः) = अपने को पवित्र करनेवाला, (आर्ष्टिषेणः) = 'इन्द्रियों, मन व बुद्धि' की सेना को वासनारूप शत्रुओं के संहार के लिए भेजनेवाला (मनुष्यः) = विचारशील पुरुष (समीधे) = समिद्ध करता है। [२] (सः) = वे आप (विश्वेभिः देवैः) = सब देवों से (अनुमद्यमानः) = प्रसन्न किये जाते हुए (वृष्टिमन्तं पर्जन्यम्) = आनन्द की वर्षा करनेवाले समाधि स्थिति के मेघ को (ईरया) = प्रेरित करिये । उस मेघ से आनन्द की वृष्टि को कराइये। [३] जब मनुष्य 'उत्तम माता, पिता व आचार्य' आदि देवों के सम्पर्क में आता है तो उसका ज्ञान बढ़ता है और उसका जीवन पवित्र होता है । यह वासनाओं का संहार करता हुआ, प्रभु-दर्शन के योग्य बनता है। इन देववृत्ति के पुरुषों से स्तुति किये जाते हुए प्रभु इन्हें आनन्द की वृष्टि का अनुभव कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- देवापि बनकर अपने जीवनों को पवित्र करते हुए हम आनन्द की वृष्टि का अनुभव करें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक राजन् ! (यत्) यदा (आर्ष्टिषेणः-देवापिः) ज्ञानशक्तिसेनासम्पन्नस्य रक्षकः पुरोहितो विद्वान् मननशीलः (त्वा समीधे) त्वां तेजस्विनं करोति (विश्वेभिः-देवैः-अनुमद्यमानः) समस्तवैज्ञानिकविद्वद्भिः-सहानुमोदनं प्राप्नुवन् (वृष्टिमन्तं पर्जन्यं प्र-ईरय) वृष्टिजलपूरितं मेघं प्रेरयति ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, whom Devapi, priest and sagely scholar of the science of rain, shining with ardent adoration among men, lights and serves with sacred fire and prayer, be pleased along with all the divine powers and move the clouds laden with rain showers for humanity.