पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (मृधः) = हमारा हिंसन करनेवाली वासनाओं को (बाधस्व) = आप बाधित करिये। (दुर्गहा) = दुःखेन गाहितव्य [ = आलोडनीय] शत्रु पुरों को (वि) = [बाधस्व] बाधित करिये।‘काम, क्रोध व लोभ' से 'इन्द्रियों, मन व बुद्धि' में बनाए गये इन असुरों के नगरों को आप विध्वस्त करिये। (अमीवाम्) = रोगों को (अपसेध) = हमारे से दूर करिये तथा (रक्षांसि अप) [ सेध] = रोगकृमियों का निषेध करिये। [२] इस प्रकार हमें शरीर व मन से स्वस्थ करके (अस्मात्) = इस (दिवः) = ज्ञान के (बृहतः समुद्रात्) = विशाल समुद्र से (अपाम्) = ज्ञानजलों के (भूमानम्) = बाहुल्य को (नः) = हमारे लिये इह यहाँ इस जीवन में (उपसृज) = समीपस्थ होते हुए उत्पन्न करिये । आपकी कृपा से हम स्वाध्याय के द्वारा अपने ज्ञान को खूब बढ़ा सकें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम वासनाओं व रोगों से अपना रक्षण कर सकें । स्वाध्याय के द्वारा ज्ञान को प्राप्त करें । सूक्त का विषय यही है कि हम ज्ञान को बढ़ाकर जीवन को पवित्र बनाते हुए प्रभु को प्राप्त करनेवाले हों। अगले सूक्त का ऋषि वासनाओं का उद्गिरण करनेवाला 'वम्र' है, यह वासनाओं को विशेषरूप से खोदनेवाला 'वैखानस' है। यह कहता है कि-