वांछित मन्त्र चुनें
419 बार पढ़ा गया

ते अद्र॑यो॒ दश॑यन्त्रास आ॒शव॒स्तेषा॑मा॒धानं॒ पर्ये॑ति हर्य॒तम् । त ऊ॑ सु॒तस्य॑ सो॒म्यस्यान्ध॑सों॒ऽशोः पी॒यूषं॑ प्रथ॒मस्य॑ भेजिरे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

te adrayo daśayantrāsa āśavas teṣām ādhānam pary eti haryatam | ta ū sutasya somyasyāndhaso ṁśoḥ pīyūṣam prathamasya bhejire ||

पद पाठ

ते । अद्र॑यः । दश॑ऽयन्त्रासः । आ॒शवः॑ । तेषा॑म् । आ॒ऽधान॑म् । परि॑ । ए॒ति॒ । ह॒र्य॒तम् । ते । ऊँ॒ इति॑ । सु॒तस्य॑ । सो॒म्यस्य॑ । अन्ध॑सः । अं॒शोः । पी॒यूष॑म् । प्र॒थ॒मस्य॑ । भे॒जि॒रे॒ ॥ १०.९४.८

419 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:94» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:30» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते)  वे विद्वान्  (अद्रयः) श्लोककृत्-वाक्-प्रचारक-विद्योपदेशक (दशयन्त्रासः) दश अङ्गुलियों से बनाये हैं यन्त्र जिन्होंने, ऐसे कलाकार अथवा दश श्लोकयन्त्र चार वेद छैः वेदाङ्ग के जाननेवाले (आशवः) शीघ्रकारी कला विद्या में व्याप्त या आप्तजन (तेषाम्-आधानम्) उनमें भलीभाँति ज्ञान का साधन मन (हर्यतं परि एति) कमनीय परमात्मा के प्रति परिपूर्णरूप से जाता है (ते-ऊ) वे ही (सुतस्य-अन्धसः) उपासित ध्यान योग्य (सोम्यस्य) शान्तरूप परमात्मसम्बन्धी (प्रथमस्य) प्रमुख सर्वश्रेष्ठ (अंशोः) शान्तिप्रद परमात्मा के (पीयूषम्) आनन्दामृत को (भेजिरे) सेवन करते हैं और कराते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - उत्तम कलाकार, जो अपने दोनों हाथों से निरन्तर कर्म करते हुए अपने लिए तथा जनहित कलाओं का निर्माण करते हैं, एवं वे विद्वान् धन्य हैं, जो चारों वेदों और छैः अङ्गों का अध्ययन करते तथा अन्यों को पढ़ाकर अपना समय सार्थक करते हैं और मन को पवित्र और संयत बनाकर परमात्मा का ध्यान कर अनन्त आनन्दामृत का आस्वादन करते हैं ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पीयूष सेवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ते) = गत मन्त्र के वे अर्चनीय 'दशावनि' पुरुष (अद्रयः) = आदरणीय होते हैं। (दशयन्त्रासः) = दसों इन्द्रियों का ठीक प्रकार से नियमन करते हैं। इस नियमन के कारण ही तो वे आदरणीय होते हैं और इस नियमन के लिए वे (आशवः) = शीघ्रता से कार्यों में व्यापनवाले होते हैं। सदा कार्यों में लगे रहते हैं । यह कार्यतत्परता ही उन्हें विषयों में फँसने से बचाती है। (तेषाम्) = इन पुरुषों का (हर्यतम्) = अत्यन्त कान्त, सुन्दर व चाहने योग्य (आधानम्) = आधार (पर्येति) = सब ओर गया हुआ है, अर्थात् सर्वव्यापक वह कान्त प्रभु ही इनका आधार होता है। उस प्रभु में स्थित हुए-हुए ये अपने कार्यों में लगे रहते हैं । [२] (ते) = वे नियतकर्मों में नित्यतत्पर पुरुष (उ) = निश्चय से (सुतस्य) = शरीर में रस रुधिरादि क्रम से उत्पन्न हुए हुए (सोम्यस्य) = सोम [= वीर्य] सम्बन्धी (प्रथमस्य) = सर्वोत्कृष्ट (अंशोः) = प्रकाश की किरणभूत (अन्धसः) = भोजन के (पीयूषम्) = अमृत का (भेजिरे) = सेवन करते हैं । वीर्य का रक्षण ही इनका अमृत भोजन हो जाता है। यह इनके अन्दर ज्ञान की किरणों के प्रकाश का हेतु बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम इन्द्रियों का नियमन करके आदरणीय जीवनवाले बनें। प्रभु ही हमारे आधार हों । सोम को अमृत जानकर हम उसे रक्षित करनेवाले हों ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) ते विद्वांसः (अद्रयः) श्लोककृतः-वाक्-प्रचारकाः-विद्योपदेशकाः “अद्रिरसि श्लोककृत्” [काठ० १।५] (दशयन्त्रासः) दशयन्त्राः “दशभिरङ्गुलीभिः कृतानि यन्त्राणि यैस्ते कलाकारकाः” यद्वा दश श्लोकयन्त्राणि चत्वारो वेदाः षडङ्गानि च तेषां “समस्वरन् श्लोकयन्त्रासः” [ऋ० १०।७३।६] (आशवः) शीघ्रकारिणः कलाविद्यासु व्याप्ता आप्ता वा (तेषाम्-आधानं हर्यतम्-परि एति) तेषां विदुषामाधानमाधीयते समन्ताद् धीयते ध्यायते धार्यते यस्मिन् तन्मानो खलु हर्यतं कमनीयं परमात्मानं प्रति परिपूर्णरूपेण गच्छति “हर्यति कान्तिकर्मा” [निघ० २।६] (ते-ऊ) ते हि (सुतस्य-अन्धसः) उपासितस्य आध्यानीयस्य समन्ताद् ध्यातुं योग्यस्य (सोम्यस्य-प्रथमस्य-अंशोः) शान्तरूप परमात्मविषयस्य प्रमुखस्य सर्वश्रेष्ठस्य शान्तिकरस्य (पीयूषं भेजिरे) आनन्दामृतं भजन्ते स्वयं सेवन्ते अन्यांश्च सेवयन्ति ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - They are the sages and scholars strong as adamant, high as mountains, roaring as clouds, working with tenfold discipline and freedom of mind, fast and instant workers and thinkers whose total energy and attention is concentrated on the one central end and aim of life: the creation of joy. And they alone share and enjoy the first, original and immortal nectar sweet of the blissful energy and ecstasy of life created and refined by sages.