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उ॒ग्रा इ॑व प्र॒वह॑न्तः स॒माय॑मुः सा॒कं यु॒क्ता वृष॑णो॒ बिभ्र॑तो॒ धुर॑: । यच्छ्व॒सन्तो॑ जग्रसा॒ना अरा॑विषुः शृ॒ण्व ए॑षां प्रो॒थथो॒ अर्व॑तामिव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ugrā iva pravahantaḥ samāyamuḥ sākaṁ yuktā vṛṣaṇo bibhrato dhuraḥ | yac chvasanto jagrasānā arāviṣuḥ śṛṇva eṣām prothatho arvatām iva ||

पद पाठ

उ॒ग्राःऽइ॑व । प्र॒ऽवह॑न्तः । स॒म्ऽआय॑मुः । सा॒कम् । यु॒क्ताः । वृष॑णः । बिभ्र॑तः । धुरः॑ । यद् । श्व॒सन्तः॑ । ज॒ग्र॒सा॒नाः । अरा॑विषुः । शृ॒ण्वे । ए॒षा॒म् । प्रो॒थथः॑ । अर्व॑ताम्ऽइव ॥ १०.९४.६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:94» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:30» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:6


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (साकं युक्ताः) साथ रथ में युक्त हुए (धुरः-बिभ्रतः) रथधुरा को धारण करते हुए (वृषणः) बलवान् (उग्राः) वेगशील (प्रवहन्तः-इव) प्रवहन करनेवाले घोड़ों के समान (समायमुः) ये विद्वान् मनुष्यसमाज को यथावत् नियमित करते हैं, अपने उपदेश के अनुसार चलाते हैं (यत्) जब (श्वसन्तः) आश्वासन देते हुए (जग्रसानाः) सुखभोग कराते हुए (अराविषुः) उस मानवसमाज को उपदेश देते हैं, तो (अर्वताम्) घोड़ों का (प्रोथथः-इव) हिनहिनाने शब्द के समान (एषां शृण्वे) इनका उपदेश सुना जाता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् जन मानवसमाज का वहन करते हैं, जैसे अच्छे घोड़े रथ को वहन करते हैं, मानवसमाज को नियमित ठीक चलते देखकर वे प्रसन्न होते हुए उत्तमोत्तम उपदेश किया करते हैं, जैसे अच्छे चलते हुए रथ को देखकर घोड़े प्रसन्नता से हिनहिनाना शब्द करते हैं ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सतत स्मरण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के सुपर्ण (उग्राः इव) = अत्यन्त तेजस्वियों के समान होते हैं। प्रवहन्तः = अपने कर्त्तव्य कर्मों को करते हुए (सं आयमुः) = सम्यक्तया अपना नियमन करते हैं। (साकं युक्ताः) = मिलकर एक लक्ष्य से कार्य में जुटे हुए ये लोग (वृषण:) = शक्तिशाली होते हैं और (धुरः बिभ्रतः) = कार्य धुराओं को धारण करनेवाले कार्य धुरन्धर बनते हैं । [२] (यत्) = क्योंकि ये (श्वसन्तः) = श्वास प्रश्वास लेते हुए तथा (जग्रसाना:) = खाते पीते हुए (अराविषुः) = प्रभु के नामों का उच्चारण करते हैं सो (एषां प्रोथथः) = इनके मुखों से उसी प्रकार ये प्रभु के नाम (शृण्वे) = सुने जाते हैं (इव) = जैसे कि (अर्वताम्) = घोड़ों के मुख से हिनहिनाने का शब्द सुनाई पड़ता है। शक्तिशाली घोड़ा खूब तीव्रगति से चलता है और रुकने पर हिनहिनाता है। ये सुपर्ण भी खूब उग्र बनकर कार्य करते हैं। बीच-बीच में कार्य विश्रामों के समय प्रभु के नामों का उच्चारण करते हैं। खाते, पीते व श्वासप्रश्वास लेते हुए ये प्रभु का स्मरण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु भक्त तेजस्वी, संयमी व मिलकर कार्य करनेवाले होते हैं। ये खाते, पीते व श्वास लेते हुए भी प्रभु के नामों का उच्चारण करते हैं, सदा प्रभु स्मरणवाले होते हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (साकं युक्ताः) सह रथे युक्ताः (धुरः-बिभ्रतः-वृषणः) रथधुरं धारयन्तो बलवन्तः (उग्राः-प्रवहन्तः-इव) वेगशीलाः प्रवोढारोऽश्वा इव (समायमुः) एते विद्वांसः-मनुष्यसमाजं सम्यक्-आयतं कुर्वन्ति स्वोपदेशे चालयन्ति (यत्) यदा (श्वसन्तः-जग्रसानाः-अराविषुः) आश्वासयन्तः आश्वासनं प्रयच्छन्तः सुखेन ग्रासयमानाः सुखभोगं कार्यन्तस्तं मानवसमाजमुपदिशन्ति तदा (अर्वतां प्रोथथः-इव एषां शृण्वे) अश्वानां ह्रेष शब्द इव “प्रोथत् शब्दं कुर्वत्” [ऋ० ७।३।२ दयानन्दः] उपदेशः श्रूयते ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like virile bulls yoked together bearing the chariot pole and drawing the chariot forward, they, inspired and mighty enthusiastic, lead humanity forward. Breathing, panting, happily accepting all pleasure and pain of social experience, they go on proclaiming their message, and the echoes of their proclamation is heard like the breathing of victorious race horses.