पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अद्रयः) = [these who adore] उपासक लोग (इत्) = निश्चय से (तद् वदन्ति) = उस प्रभु के नामों का ही उच्चारण करते हैं। यह नामोच्चारण ही उनके (विमोचने) = विषयों से विमोचन में निमित्त बनता है । इस नामोच्चारण के कारण ही वे विषयों में फँसने से बचे रहते हैं । (उपब्दिभिः) = इन प्रभु के नामोंच्चारणों से (इत् घा) = ही निश्चय से ये व्यक्ति (यामन्) = इस जीवन मार्ग में (अस्पा इव) = अपने को ठीक-ठीक रक्षित करनेवाले होते हैं। [अञ्जसापान्ति] [२] (इव) = जैसे (धान्याकृतः) = धान्य आदि को उत्पन्न करनेवाले (बीज वपन्तः) = बीज का वपन [ = बोना] करते हैं, इसी प्रकार ये प्रभु नाम-स्मरण करनेवाले लोग गुणों के बीजों को अपने हृदयक्षेत्र में बोते हैं और इस गुणवर्धन के द्वारा हृदयक्षेत्र को सुन्दर बनाते हुए ये लोग (सोमं पृञ्चन्ति) = उस सोम का, शान्त प्रभु का सम्पर्क प्राप्त करते हैं। [३] ये (बप्सतः) = भोजनों को करते हुए (न मिनन्ति) = कभी हिंसा नहीं करते। हिंसालभ्य, मांसादि भोजनों से ये दूर रहते हैं। ये अपने दाँतों को अथर्व के शब्दों में यही प्रेरणा देते हैं कि चावल, जौ, उड़द व तिल का सेवन करो, यही तुम्हारा रमणीयता के लिए भाग नियत है। तुमने हिंसा नहीं करनी, हिंसालभ्य भोजन से दूर ही रहना है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उपासक प्रभु का स्मरण करते हैं, यह स्मरण उन्हें मार्गभ्रष्ट होने से बचाता है । अपने में गुणों के बीजों को बोते हुए प्रभु से सम्पर्कवाले होते हैं।