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ऋ॒भुॠ॑भु॒क्षा ऋ॒भुर्वि॑ध॒तो मद॒ आ ते॒ हरी॑ जूजुवा॒नस्य॑ वा॒जिना॑ । दु॒ष्टरं॒ यस्य॒ साम॑ चि॒दृध॑ग्य॒ज्ञो न मानु॑षः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛbhur ṛbhukṣā ṛbhur vidhato mada ā te harī jūjuvānasya vājinā | duṣṭaraṁ yasya sāma cid ṛdhag yajño na mānuṣaḥ ||

पद पाठ

ऋ॒भुः । ऋ॒भु॒क्षाः । ऋ॒भुः । वि॒ध॒तः । मदः॑ । आ । ते॒ । हरी॒ इति॑ । जू॒जु॒वा॒नस्य॑ । वा॒जिना॑ । दु॒स्तर॑म् । यस्य॑ । साम॑ । चि॒त् । ऋध॑क् । य॒ज्ञः । न । मानु॑षः ॥ १०.९३.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:93» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:27» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋभुक्षाः-ऋभुः) परमात्मा महान् और ज्ञान से भासमान है  (विधतः-मदः-ऋभुः) जगत् को रचनेवाले का हर्ष-आनन्द ज्ञान से भरा हुआ है (जूजुवानस्य) बहुत प्रेरित करते हुए तेरे (वाजिना हरी) बलवान् हरणशील कर्मानुसार संसार और मोक्ष में लाने ले जाने धर्मवाले दण्ड प्रसाद हैं (यस्य साम चित्-दुष्टरम्) जिसका अन्तकर्म और स्तवन पापियों से दुस्तरणीय है। (यज्ञः-न मानुषः-ऋधक्) अध्यात्मयज्ञ मानुष-साधारण मनुष्य से साधनेयोग्य द्रव्ययज्ञ नहीं, किन्तु पृथक् मुमुक्षुओं से साध्य है ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा महान् ज्ञान से प्रकाशमान है। उस विधाता का आनन्द भी ज्ञान से भरा हुआ है, उसके कर्मानुसार दण्ड और प्रसाद संसार मोक्षफलवाले हैं, उसकी प्राप्ति के लिये अध्यात्मयज्ञ किया जाता है ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उपासक का अतिमानव रूप

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋभुक्षा:) = वे महान् प्रभु (ऋभुः) = [ऋतेन भाति] अपने सत्यस्वरूप से देदीप्यमान हैं। (विधतः) = इस प्रभु को उपासक का (मदः) = हर्ष (ऋभुः) = यज्ञों से दीप्त होता है, अर्थात् प्रभु का उपासक आनन्द का अनुभव करता है और उसे यज्ञों में ही आनन्द मिलता है। [२] हे प्रभो ! (जूजुवानस्य) = निरन्तर गति देनेवाले (ते) = आपके दिये हुए ये (हरी) = इन्द्रियरूप अश्व (आवाजिना) = सब प्रकार से शक्तिशाली होते हैं । एक व्यक्ति आपकी प्रेरणा में चलता है तो उसकी ये इन्द्रियाँ क्षीणशक्ति न होकर सबल ही बनी रहती हैं। [३] हे प्रभो ! आप तो वे हैं (यस्य) = जिनकी (साम) = उपासना (चित्) = भी (दुष्टरम्) = शत्रुओं से अभिभूत नहीं हो पाती। आपके उपासक को काम-क्रोधादि शत्रु दबा नहीं सकते। [४] आपके उपासक का (यज्ञः) = यज्ञ भी (ऋधक्) = पृथक् ही होता है, (न मानुषः) = सामान्य मनुष्यों से किये जानेवाले यज्ञ की तरह वह नहीं होता, उपासक का यज्ञ असाधारण व अलौकिक होता है। वस्तुतः इस उपासक में प्रभु की ही शक्ति काम कर रही होती है । उस शक्ति से शक्ति-सम्पन्न होकर वह अतिमानव प्रतीत होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - महान् प्रभु अपने सत्यस्वरूप में देदीप्यमान हैं। प्रभु का उपासक भी कामादि से अभिभूत न होता हुआ अतिमानव यज्ञों को करने में समर्थ होता है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋभुक्षाः-ऋभुः) परमात्मा महान् “ऋभुक्षा-महन्नाम” [निघ० ३।३] ऋतेन ज्ञानेन भानवान् “ऋभवः-ऋतेन भान्ति” [निरु० ११।१६] (विधतः-मदः-ऋभु) जगतो रचयितुर्हर्षः-ज्ञानेन भानवानस्ति (ते जूजुवानस्य) भृशं प्रेर्यमाणस्य तव (वाजिना हरी) बलवन्तौ हरणशीलौ कर्मानुरूपं संसारमोक्षयोरानयन-नयनधर्माणौ दण्डप्रसादौ स्तः (यस्य साम चित्-दुष्टरम्) यस्यान्तकर्मस्तवनं चित् खलु पापैर्दुस्तरणीयम् (यज्ञः-न मानुषः-ऋधक्) अध्यात्मयज्ञो न हि मानुषः साधारणजनसाध्यो द्रव्ययज्ञः किन्तु पृथक् खलु देवैर्मुमुक्षुभिः साध्यः ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Great is Indra, cosmic energy, great is the joy of the creator of cosmic energy. O mighty lord of cosmic energy, great are the complementary currents of your energy circuit. Grand, not easy, is the knowledge and articulation of the divine energy of nature, and its management too at the human level as yajnic process is not easy.