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उ॒त नो॑ दे॒वाव॒श्विना॑ शु॒भस्पती॒ धाम॑भिर्मि॒त्रावरु॑णा उरुष्यताम् । म॒हः स रा॒य एष॒तेऽति॒ धन्वे॑व दुरि॒ता ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta no devāv aśvinā śubhas patī dhāmabhir mitrāvaruṇā uruṣyatām | mahaḥ sa rāya eṣate ti dhanveva duritā ||

पद पाठ

उ॒त । नः॒ । दे॒वौ । अ॒श्विना॑ । शु॒भः । पती॒ इति॑ । धाम॑ऽभिः । मि॒त्रावरु॑णौ । उ॒रु॒ष्य॒ता॒म् । म॒हः । सः । रा॒यः । आ । ई॒ष॒ते॒ । अति॑ । धन्वा॑ऽइव । दुः॒ऽइ॒ता ॥ १०.९३.६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:93» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:27» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:6


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) और (शुभस्पती) कल्याण के पालक (मित्रावरुणौ) शुभ कर्म में प्रेरक और स्व स्नेह में वरनेवाले (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक (देवौ) दोनों विद्वान् (धामभिः) अपने-अपने विद्याङ्गों-विद्याविभागों के द्वारा (नः-उरुष्यताम्) हमारी रक्षा करें (सः) वह तुम्हारे द्वारा रक्षित मनुष्य (महः-रायः) महान् धनों को (एषते) प्राप्त करता है (धन्व-इव दुरिता-अति) मरुस्थलों की भाँति दुःखों को लाँघ जाता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - कल्याणचिन्तक उत्तम प्रेरक और स्नेह में वरनेवाले अध्यापक और उपदेशक अपने-अपने विद्याङ्गों के द्वारा मनुष्यों की रक्षा करते हैं, जो उनकी सङ्गति में आता है, वह महान् धनों से सम्पन्न हो जाता है और दुःखों को तर जाता है ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रेगिस्तान के पार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उत) = और (नः) = हमारे लिए (अश्विनौ देवौ) = प्राणापान हमारे काम-क्रोधादि शत्रुओं को जीतने की कामनावाले हों [दिव् विजिगीषा]। हम प्राणसाधना के द्वारा इन सब शत्रुओं को नष्ट कर सकें। वस्तुतः ये प्राणापान इस प्रकार हमारे दोषों को दग्ध करके (शुभस्पती) = शुभ के रक्षक हैं। अशुभ को ये दूर करते हैं और शुभ का रक्षण करते हैं । [२] काम-क्रोधादि को जीतकर हम राग-द्वेषादि से ऊपर उठते हैं। इनसे ऊपर उठकर हम सबके प्रति स्नेह करनेवाले 'मित्र' तथा किसी से द्वेष न करनेवाले 'वरुण' बनते हैं। ये (मित्रावरुणा) = स्नेह व निर्दोषता के भाव (धामभिः) = तेजस्विताओं के द्वारा (उरुष्यताम्) = हमारा रक्षण करें। द्वेष से मनुष्य अन्दर ही अन्दर जलता रहता है और उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। [३] इस प्रकार शक्ति का रक्षण करके (स) = वह प्राणसाधक पुरुष (महः राय:) = महत्त्वपूर्ण ऐश्वर्य को (आ ईषते) = सर्वथा प्राप्त होता है और (दुरिता अति) = सब दुरितों व दुर्गतियों को इस प्रकार पार कर जाता है (इव) = जैसे (धन्वा) = कोई पथिक रेगिस्तान को पार कर जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-प्राणसाधना से अशुभ वृत्तियाँ का नाश होकर शुभवृत्तियों का विकास होता है। ईर्ष्या-द्वेषादि से ऊपर उठकर मनुष्य तेजस्वी बनता है। शुभ ऐश्वर्यों को प्राप्त करके दुर्गतियों को पार कर जाता है । इस साधक के लिए सांसारिक विषय मरुस्थल के समान हो जाते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) अपि च (शुभस्पती) कल्याणस्य पालकौ (मित्रावरुणौ) प्रेरकवरयितारौ (अश्विना) अध्यापकोपदेशकौ “अश्विना अध्यापकोपदेशकौ” [ऋ० ५।७८।३ दयानन्दः] (देवौ) विद्वांसौ (धामभिः) स्वस्वविद्याङ्गैः “अङ्गानि वै धामानि” [का०श० ४।३।४।११] (नः-उरुष्यताम्) अस्मान् रक्षताम् “उरुष्यति रक्षाकर्मा” [निरु० ५।२३] (सः-महः-रायः-एषते) स युवाभ्यां रक्षितो जनो महान्ति धनानि प्राप्नोति, अथ च (धन्व-इव दुरिता-अति) मरुस्थलानीव “धन्वानि-अविद्यमानोदकादिदेशान्” [ऋ० ५।८३।१० दयानन्दः] दुःखानि अतिक्रामति ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And may the divine Ashvins, complementary currents of natural energy, Mitra and Varuna, prana and udana energies of the body system vibrating in nature, protect and promote us. One whom they protect and promote rises great in wealth, rules it as the master and crosses over all evils with a single leap.