पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सूरः चित्) = सूर्य भी अस्य इस प्रभु की ही (हरितः) = इन किरणरूप अश्वों को (आरीरमत्) = चारों ओर क्रीड़ा कराता है । अर्थात् सूर्य की किरणें क्या हैं, ये तो प्रभु के प्रकाश की ही किरणें हैं। प्रभु के प्रकाश से ही तो ये प्रकाशित हो रही हैं । (इन्द्रात्) = उस परमैश्वर्यशाली (तवीयसः) = प्रवृद्ध शक्तिवाले प्रभु से ही (कश्चित्) = जो भी कोई है वह (आभयते) = समन्तात् भयभीत होता है ' भयादस्याग्निस्तपति, भयात्तपति सूर्य:, भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ' । प्रभु के भय से ही 'अग्नि, सूर्य, इन्द्र, वायु व मृत्यु' अपना-अपना कार्य कर रहे हैं । [२] (भीमस्य) = उस अपनी तेजस्विता से भयंकर (वृष्णः) = शक्तिशाली, (अभिश्वसः) = चारों ओर जीवन का संचार करनेवाले प्रभु के (जठरात्) = विराट् शरीर के जठरभूत अन्तरिक्ष से (अबाधितः) = प्रबल वायु आदि से बाधित न हुआ हुआ छिन्न-भिन्न न किया गया, (सहुरिः) = अन्न आदि के उत्पादन से कष्टों का मर्षण व पराभव करनेवाला मेघ (दिवेदिवे) = समय-समय पर (स्तन्) = गर्जना करता है। 'दिवे-दिवे' का शब्दार्थ 'अनुदिन सदा' होता है, यहाँ 'समय-समय पर यह भाव व्यक्त किया गया है। जब-जब आवश्यकता होती है, तब-तब यह बरसता है और प्रजाओं के भूख के कष्ट को दूर करने का साधन बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सूर्य में प्रभु के ही प्रकाश की किरणें हैं और मेघ में वृष्टि द्वारा अन्नोत्पत्ति से जीवन का संचार करने की शक्ति प्रभु ही स्थापित करते हैं ।