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सूर॑श्चि॒दा ह॒रितो॑ अस्य रीरम॒दिन्द्रा॒दा कश्चि॑द्भयत॒ज तवी॑यसः । भी॒मस्य॒ वृष्णो॑ ज॒ठरा॑दभि॒श्वसो॑ दि॒वेदि॑वे॒ सहु॑रिः स्त॒न्नबा॑धितः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sūraś cid ā harito asya rīramad indrād ā kaś cid bhayate tavīyasaḥ | bhīmasya vṛṣṇo jaṭharād abhiśvaso dive-dive sahuriḥ stann abādhitaḥ ||

पद पाठ

सूरः॑ । चि॒त् । आ । ह॒रितः॑ । अ॒स्य॒ । री॒र॒म॒त् । इन्द्रा॑त् । आ । कः । चि॒त् । भ॒य॒ते॒ । तवी॑यसः । भी॒मस्य॑ । वृष्णः॑ । ज॒ठरा॑त् । अ॒भि॒ऽश्वसः॑ । दि॒वेऽदि॑वे । सहु॑रिः । स्त॒न् । अबा॑धितः ॥ १०.९२.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:92» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:24» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूरः-चित्) सूर्य भी (अस्य) इस परमात्मा के शासन में वर्त्तमान (हरितः-आ रीरमत्) दिशाओं में रमण करता है-प्रकाश करता है (कः-चित्) कोई अन्य भी बलवान् वायु आदि पदार्थ (तवीयसः-इन्द्रात्) अति बलवान् परमेश्वर से (भयते) भय करता है (भीमस्य वृष्णः) उस भयङ्कर बलवान् परमात्मा के (जठरात्) मध्य में वर्तमान अन्तरिक्ष से (दिवे दिवे) अवसर-अवसर पर (अभिश्वसः) श्वास ग्रहण करता हुआ सा मेघ (सहुरिः) सहनशील (अबाधित) बाधारहित (स्तन्) गर्जता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के शासन में-नियम में रहता हुआ सूर्य दिशाओं में प्रकाश करता है तथा वायु आदि वेगवान् पदार्थ भी उस अति बलवान् परमात्मा से भय करते हुए से चलते हैं, उस भयंकर बलवान् परमात्मा के शासन से मेघ गरजता हुआ बरसता है, उस ऐसे परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूर्य व मेघ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सूरः चित्) = सूर्य भी अस्य इस प्रभु की ही (हरितः) = इन किरणरूप अश्वों को (आरीरमत्) = चारों ओर क्रीड़ा कराता है । अर्थात् सूर्य की किरणें क्या हैं, ये तो प्रभु के प्रकाश की ही किरणें हैं। प्रभु के प्रकाश से ही तो ये प्रकाशित हो रही हैं । (इन्द्रात्) = उस परमैश्वर्यशाली (तवीयसः) = प्रवृद्ध शक्तिवाले प्रभु से ही (कश्चित्) = जो भी कोई है वह (आभयते) = समन्तात् भयभीत होता है ' भयादस्याग्निस्तपति, भयात्तपति सूर्य:, भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ' । प्रभु के भय से ही 'अग्नि, सूर्य, इन्द्र, वायु व मृत्यु' अपना-अपना कार्य कर रहे हैं । [२] (भीमस्य) = उस अपनी तेजस्विता से भयंकर (वृष्णः) = शक्तिशाली, (अभिश्वसः) = चारों ओर जीवन का संचार करनेवाले प्रभु के (जठरात्) = विराट् शरीर के जठरभूत अन्तरिक्ष से (अबाधितः) = प्रबल वायु आदि से बाधित न हुआ हुआ छिन्न-भिन्न न किया गया, (सहुरिः) = अन्न आदि के उत्पादन से कष्टों का मर्षण व पराभव करनेवाला मेघ (दिवेदिवे) = समय-समय पर (स्तन्) = गर्जना करता है। 'दिवे-दिवे' का शब्दार्थ 'अनुदिन सदा' होता है, यहाँ 'समय-समय पर यह भाव व्यक्त किया गया है। जब-जब आवश्यकता होती है, तब-तब यह बरसता है और प्रजाओं के भूख के कष्ट को दूर करने का साधन बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सूर्य में प्रभु के ही प्रकाश की किरणें हैं और मेघ में वृष्टि द्वारा अन्नोत्पत्ति से जीवन का संचार करने की शक्ति प्रभु ही स्थापित करते हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूरः-चित्-अस्य-हरितः-आ रीरमत्) सूर्यः खल्वप्यस्य परमात्मनः शासने वर्तमानो दिशः-दिक्षु ‘हरितः-दिङ्नाम’ [निघ० १।६] रमते प्रकाशते (कः-चित्) कश्चिदन्योऽपि बलवान् वायुप्रभृतिपदार्थः (तवीयसः-इन्द्रात्-भयते) अति बलवतः परमेश्वरात् खलु बिभेति ‘भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः’ [कठोप० २।३।३] (भीमस्य वृष्णः-जठरात्) भयङ्करस्य मध्यादन्तरिक्षात् (दिवे-दिवे) अवसरेऽवसरे (अभिश्वसः) अभिश्वासं गृह्णन्निव गच्छन् मेघः (सहुरिः) सहनशीलः (अबाधितः) बाधारहितः (स्तन्) गर्जति ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Even the sun radiates its rays of light under the power and law of Indra, supreme omnipotent. Every powerful force obeys the law and power of Indra. Under the power of fertile and potent Indra, the whistling winds blow from its vault and the mighty cloud roars without obstruction day by day.