वांछित मन्त्र चुनें
427 बार पढ़ा गया

इन्द्रे॒ भुजं॑ शशमा॒नास॑ आशत॒ सूरो॒ दृशी॑के॒ वृष॑णश्च॒ पौंस्ये॑ । प्र ये न्व॑स्या॒र्हणा॑ ततक्षि॒रे युजं॒ वज्रं॑ नृ॒षद॑नेषु का॒रव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indre bhujaṁ śaśamānāsa āśata sūro dṛśīke vṛṣaṇaś ca pauṁsye | pra ye nv asyārhaṇā tatakṣire yujaṁ vajraṁ nṛṣadaneṣu kāravaḥ ||

पद पाठ

इन्द्रे॑ । भुज॑म् । श॒श॒मा॒नासः॑ । आ॒श॒त॒ । सूरः॑ । दृशी॑के । वृष॑णः । च॒ । पौंस्ये॑ । प्र । ये । नु । अ॒स्य॒ । अ॒र्हणा॑ । त॒त॒क्षि॒रे । युज॑म् । वज्र॑म् । नृ॒ऽसद॑नेषु । का॒रवः॑ ॥ १०.९२.७

427 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:92» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:7


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शशमानासः) परमात्मा की प्रशंसा करनेवाले (इन्द्रे भुजम्-आशत) ऐश्वर्यवान् परमात्मा में-उसके आश्रय में रक्षण और आनन्द भोग को प्राप्त करते हैं (सूरः-वृषणः-च) जो सूर्य की भाँति तथा वृषभ की भाँति हैं, (तस्य) उसके (दृशीके पौंस्ये) दर्शन और पौरुष में स्थित होते हैं (ये-नु) जो भी (कारवः) स्तुति करनेवाले (अस्य-अर्हणा ततक्षिरे) इसकी पूजा करते हैं (नृसदनेषु युजं वज्रं) विद्वत्सदनों में योजनीय ओज को प्राप्त करते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ज्ञानप्रकाशक और सुखवर्षक है। जो महानुभाव उसकी प्रशंसा करनेवाले होते हैं, वे उसके रक्षण और आनन्दभोग को प्राप्त करते हैं तथा उसके दर्शन और स्वरूप में निमग्न रहते हैं, सभा सम्मेलन स्थानों में उसकी पूजा प्रशंसा करते हुए उत्तम ओज को प्राप्त होते हैं ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूरो दृशीके, वृषणश्च पौंस्ये

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (शशमानासः) = शशक [खरगोश] के समान सदा प्लुतगतिवाले लोग, कर्मशील व्यक्ति (इन्द्रे) = उस परमात्मा में प्रभु के आधार में (भुजम्) = सब भोगों को आशत प्राप्त करते हैं। अपने कर्मों में सदा लगे हुए व्यक्तियों का खान-पान प्रभु कृपा से चलता है वे प्रभु दृशीके दर्शन में (सूरः) = सूर्य के समान हैं, 'ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिः ' ' आदित्यवर्णम्' । (च) = और (पौंस्ये) = बल में (वृषण:) = सब सुखों का वर्षण करनेवाले हैं। प्रभु की शक्ति कल्याण को ही करनेवाली है । [२] (ये) = जो (नु) = अब (अस्य अर्हणा) = इस प्रभु की पूजा के द्वारा इस प्रभु को (युजम्) = अपना साथी तथा (वज्रम्) = शत्रुसंहारक अस्त्र (प्रततक्षिरे) = बनाते हैं वे (नृषदनेषु) = [नर: कर्तृत्येन सीदन्ति येषु तेषु यज्ञेषु सा० ] 'विश्वेदेवाः यजमानश्च सीदत' यज्ञों व यज्ञों की साधन भूतयज्ञवेदियों में (कारवः) = कुशलता से कर्मों को करनेवाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - श्रमशील का योगक्षेम प्रभु चलाते हैं । वे प्रभु सूर्य की तरह दीप्त व शक्तिशाली हैं। इसकी पूजा से जीव शत्रुओं को जीतता है और यज्ञों को सिद्ध करता है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शशमानासः) परमात्मनः प्रशंसमानाः “शशमानः शंसमानः” [निरु० ६।८] (इन्द्रे भुजम्-आशत) ऐश्वर्यवति परमात्मनि तदाश्रये रक्षणमानन्दभोगं वा प्राप्नुवन्ति (सूरः-वृषणः-च) यः सूर्य इव वृषभ इव-चास्ति, तस्य (दृशीके-पौंस्ये) दर्शने पौरुषे च स्थिता भवन्ति (ये नु) ये खलु (कारवः) स्तोतारः “कारुः स्तोतृनाम” [निघ० ३।१६] (अस्य-अर्हणा ततक्षिरे) एतस्य परमात्मनः पूजां कुर्वन्ति “तक्षति करोतिकर्मा” [निरु० ४।१९] (नृसदनेषु युजं वज्रं) विद्वत्सदनेषु योजनीयमोजः “वज्रो वा ओजः” [श० ८।४।१।२०] प्राप्नुवन्तीति शेषः ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, cosmic energy, is self-potent, creative and immensely fertile. In Indra, in its splendid self- manifestive power to be observed and pursued with the mind, they find possibilities of human profit, and they, creative and competent craftsmen in elite human institutions, invent usable instruments of power, prosperity and protection.