वांछित मन्त्र चुनें
522 बार पढ़ा गया

प्र रु॒द्रेण॑ य॒यिना॑ यन्ति॒ सिन्ध॑वस्ति॒रो म॒हीम॒रम॑तिं दधन्विरे । येभि॒: परि॑ज्मा परि॒यन्नु॒रु ज्रयो॒ वि रोरु॑वज्ज॒ठरे॒ विश्व॑मु॒क्षते॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra rudreṇa yayinā yanti sindhavas tiro mahīm aramatiṁ dadhanvire | yebhiḥ parijmā pariyann uru jrayo vi roruvaj jaṭhare viśvam ukṣate ||

पद पाठ

प्र । रु॒द्रेण॑ । य॒यिना॑ । य॒न्ति॒ । सिन्ध॑वः । ति॒रः । म॒हीम् । अ॒रम॑तिम् । द॒ध॒न्वि॒रे॒ । येभिः॑ । परि॑ऽज्मा । प॒रि॒ऽयन् । उ॒रु । ज्रयः॑ । वि । रोरु॑वत् । ज॒ठरे॑ । विश्व॑म् । उ॒क्षते॑ ॥ १०.९२.५

522 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:92» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ययिना रुद्रेण) मेघ में वर्तमान गतिशील विद्युद् रूप अग्नि से (सिन्धवः प्र यन्ति) बहनेवाली वृष्टिजलधाराएँ नीचे गिरती हैं (अरमतिम्-महीम्) विशाल पृथिवी को (तिरः-दधन्विरे) अन्तर्धान कर देती हैं-आच्छादित कर देती हैं (येभिः) जिन मेघस्थ वायुविशेषों के साथ (परिज्मा परियन्) सब ओर जानेवाला विद्युद्रूप अग्नि घूमता हुआ (उरुज्रयः) बहुत वेगवाला होता हुआ (जठरे रोरुवत्) अन्तरिक्ष में शब्द करता है (विश्वम्-उक्षते) सब को जल से सींच देता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - मेघ के अन्दर विद्युत् उपर से बहनेवाली वृष्टिजलधाराओं के नीचे पृथिवी पर बहा देता है, पृथिवी उनसे घिर जाती है, इस प्रकार वह विद्युत् सबको जल से सींच देता है ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नदियाँ, वायु व मेघ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ययिना) = सम्पूर्ण संसार को गति देनेवाले रुद्रेण संसार के शासक प्रभु के भय से (सिन्धवः) = नदियाँ (तिरः) = टेढ़े-मेढ़े मार्ग से (प्रयन्ति) = प्रकर्षेण गति कर रही हैं। ये नदियाँ (अरमतिम्) = इस पर्यन्तरहित (महीम्) = पृथ्वी को (दधन्विरे) = धारण कर रही हैं। खेतों की सिंचाई का साधन बनकर ये नदियाँ ही अन्नोत्पत्ति का कारण बनती हैं और इस प्रकार पृथ्वीस्थ प्राणियों का धारण करती हैं । [२] (परिज्या) = चारों ओर गतिवाला प्रभु (येभिः) = जिन मरुतों [=वायुवों] के द्वारा (परियन्) = चारों ओर गति करता हुआ (उरुज्रयः) = महान् वेगवाला (जठरे) = इस त्रिलोकी के मध्यभाग अन्तरिक्ष में (रोहवत्) = मेघों के रूप में खूब गर्जना करता है और (विश्वम्) = इस संसार को (उक्षते) = वृष्टिजल से सिक्त करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के शासन में नदियाँ चल रही हैं। प्रभु ही वायुवों व मेघों द्वारा अन्तरिक्ष में गर्जना कर रहे हैं। वे प्रभु ही वृष्टि द्वारा भूमियों को सिक्त करके अन्नोत्पादन योग्य बनाते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ययिना रुद्रेण) गतिशीलेन मेघे वर्त्तमानेन विद्युद्रूपेणाग्निना “अग्निरपि रुद्र उच्यते” [निरु० १०।७] (सिन्धवः-प्र यन्ति) स्यन्दनशीला नद्यो वृष्टिर्जलधाराः प्रगच्छन्ति (अरमतिं-महीं तिरः दधन्विरे) विशालां पृथिवीं तिरोदधति-अन्तर्दधति-आच्छादयन्ति “तिरोदधे-अन्तर्दधाति” [निरु० १२।३२] (येभिः) येभिर्मरुद्भिर्वायुविशेषैर्मेघस्थैः सह (परिज्मा परियन्) परितो गन्ता विद्युद्रूपाग्निः परिभ्रमन् (उरुज्रयः) बहुवेगवान् सन् (जठरे रोरुवत्) मध्यलोके-अन्तरिक्षे शब्दयति “मध्ये वै जठरम्” [शत० ७।१।१।२३] (विश्वम्-उक्षते) सर्वं जलेन सिञ्चति ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Showers of rain and floods of rivers which cover the earth move by the tempestuous currents of cosmic energy of the Maruts, and by the same currents the vast ocean of vapours far traversing across the middle regions roars in the womb of skies and showers and fertilises the world of life.