वांछित मन्त्र चुनें
507 बार पढ़ा गया

इ॒मम॑ञ्ज॒स्पामु॒भये॑ अकृण्वत ध॒र्माण॑म॒ग्निं वि॒दथ॑स्य॒ साध॑नम् । अ॒क्तुं न य॒ह्वमु॒षस॑: पु॒रोहि॑तं॒ तनू॒नपा॑तमरु॒षस्य॑ निंसते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imam añjaspām ubhaye akṛṇvata dharmāṇam agniṁ vidathasya sādhanam | aktuṁ na yahvam uṣasaḥ purohitaṁ tanūnapātam aruṣasya niṁsate ||

पद पाठ

इ॒मम् । अ॒ञ्जः॒ऽपाम् । उ॒भये॑ । अ॒कृ॒ण्व॒त॒ । ध॒र्माण॑म् । अ॒ग्निम् । वि॒दथ॑स्य । साध॑नम् । अ॒क्तुम् । न । य॒ह्वम् । उ॒षसः॑ । पु॒रःऽहि॑तम् । त॒नू॒३॒॑ऽनपा॑तम् । अ॒रु॒षस्य॑ । निं॒स॒ते॒ ॥ १०.९२.२

507 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:92» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:23» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:2


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इमम्-अञ्जस्पाम्) इस अनायास पालक (धर्माणम्) विश्व के धारक (विदथस्य साधनम्) अध्यात्मयज्ञ के साधक (अग्निम्) परमात्मा को (उभये) दोनों देव और मनुष्य या मुमुक्षु और साधारण जन (अकृण्वत) अपना इष्टदेव स्वीकार करते हैं (अक्तुं न यह्वम्-उषसः) जैसे स्वप्रकाश से जगत् को व्यक्त करनेवाले सूर्य को प्रातःकाल की उषाएँ दीप्तियें (पुरोहितम्) प्रथम से वर्तमान तथा (अरुषस्य तनूनपातम्) आरोचमान के चेतनस्वरूप से वर्तमान स्तोता के आत्मा को न गिरानेवाले (निंसते) चूमते हैं-आलिङ्गित करते हैं-आश्रित करते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अनायास ही विश्व का पालक है, उसे मुमुक्षु तथा साधारण जन अपना इष्टदेव मानें, उसका आश्रय लें, वह निष्पक्ष सबका कल्याणकारी है ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सर्व रक्षक प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इमम्) = इस (अञ्जस्पाम्) = [अञ्जसापाति] ठीक-ठीक रक्षण करनेवाले प्रभु को (उभये) = देव और मनुष्य दोनों ही, सकाम कर्म करनेवाले मर्त्य और निष्काम कर्म करनेवाले देव, (अकृण्वत) = अपने हृदयों में स्थापित करते हैं । उस प्रभु को जो (धर्माणम्) = धारण करनेवाले हैं, (अग्निम्) = आगे और आगे ले चलनेवाले हैं, (विदथस्य साधनम्) = ज्ञान को सिद्ध करनेवाले हैं । [२] जो प्रभु (उषसः अक्तुं न) = उषाकाल की प्रकाश की किरण के समान हैं। उस प्रभु के आविर्भूत होते ही हृदय प्रकाश से चमक उठता है । (यह्वम्) = जो महान् हैं, अथवा 'यातश्च हूतश्च' जो गाये जाते हैं और पुकारे जाते हैं. अन्ततोगत्वा सब उस प्रभु की ही शरण में जाते हैं। (पुरोहितम्) = जो प्रभु हमारे सामने [पुर: ] आदर्श के रूप से स्थापित हैं [ हितम्], अथवा जो सृष्टि से पहले ही विद्यमान हैं । (अरुषस्य) = [अ- रुष] क्रोधशून्य व्यक्ति के (तनू-न-पातम्) = शरीर को जो नहीं गिरने देनेवाले, उस प्रभु को सब देव व मनुष्य (निंसते) = [ चुम्बयन्ति आश्रयन्ते सा० ] आश्रय करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वह प्रभु सबका रक्षक, सबके हृदय में निवास करता है, उसकी शरण में रहना चाहिये ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इमम्-अञ्जस्पाम्) एतमञ्जसाऽनायासेन स्वभावेन पालकं (धर्माणम्) विश्वस्य धारकम् (विदथस्य साधनम्) अध्यात्मयज्ञस्य साधयितारं (अग्निम्) परमात्मानम् (उभये-अकृण्वत) उभये देवमनुष्याः, मुमुक्षवः साधारणजनाश्च स्वकीयेष्टदेवं स्वीकुर्वन्ति (अक्तुं न यह्वम्-उषसः) यथास्वप्रकाशेन जगतो व्यक्तीकर्त्तारं सूर्यमुषसः प्रातस्तन्य उषोनामिका दीप्तयो महान्तं (पुरोहितम्) पुरो वर्त्तमानं तथा (अरुषस्य तनूनपातम्) आरोचमानस्य चेतनत्वस्वरूपतो वर्त्तमानस्य स्तोतुरात्मानं न पातयितारम् ‘आत्मा वै तनूः’ [श० ६।७।२।६] (निंसते) चुम्बन्ति-आश्रयन्ति “निसते चुम्बति” [ऋ० १।१४४।१ दयानन्दः] ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Both humans and divines honour and adore this Agni, by nature energising life constantly, sustainer of the world and its dharma, accomplisher of yajna. They love and adore it like the mighty sun, harbinger of the dawn and child inviolable of the blazing cosmic energy.