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यं दे॒वासोऽज॑नयन्ता॒ग्निं यस्मि॒न्नाजु॑हवु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ । सो अ॒र्चिषा॑ पृथि॒वीं द्यामु॒तेमामृ॑जू॒यमा॑नो अतपन्महि॒त्वा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaṁ devāso janayantāgniṁ yasminn ājuhavur bhuvanāni viśvā | so arciṣā pṛthivīṁ dyām utemām ṛjūyamāno atapan mahitvā ||

पद पाठ

यम् । दे॒वासः॑ । अज॑नयन्त । अ॒ग्निम् । यस्मि॑न् । आ । अजु॑हवुः । भुव॑नानि । विश्वा॑ । सः । अ॒र्चिषा॑ । पृ॒थि॒वीम् । द्याम् । उ॒त । इ॒माम् । ऋ॒जु॒ऽयमा॑नः । अ॒त॒प॒त् । म॒हि॒ऽत्वा ॥ १०.८८.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:88» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:11» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवासः) मुमुक्षुजन (यम्-अग्निम्) जिस वैश्वानर अग्नि परमात्मा को अपने आत्मा में (अजनयन्त) प्रादुर्भूत करते हैं (यस्मिन्) जिसके आश्रय (विश्वा-भुवनानि) सारे भाव-कामनाओं को समर्पित करते हैं (सः-अर्चिषा) वह अपने तेज से (द्यां पृथिवीम्-उत-इमाम्) द्युलोक पृथिवी-फैले हुए अन्तरिक्ष को उत्पन्न करता है (महित्वा-ऋजूयमानः) महत्त्व से सरलभाव से प्रकाशित करता है-उत्पन्न करता है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'निर्माता व प्रकाशक' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (देवासः) = देववृत्ति के पुरुष (यं अग्निम्) = जिस अग्रेणी प्रभु को (अजनयन्त) = अपने हृदयों में आविर्भूत करते हैं, दिव्यवृत्ति को बनाकर जिस प्रभु का हृदय - मन्दिर में दर्शन करते हैं । (यस्मिन्) = जिस प्रभु प्राप्ति के निमित्त (विश्वा भुवनानि) = सब लोक (आजुहवुः) = सर्वथा हवि का सेवन करते हैं, हवि सेवन के द्वारा ही प्रभु का अर्चन होता है और यह अर्चक ही प्रभु का दर्शन कर पाता है । [२] (सः) = वे प्रभु ही (अर्चिषा) = अपनी ज्ञानदीप्ति से (ऋजूयमानः) = सरलता से सब कार्यों को करते हुए (पृथिवीम्) = अन्तरिक्ष को (द्याम्) = द्युलोक को (उत) = और (इमाम्) = इस पृथिवी को (महित्वा) = अपनी महिमा से (अतपत्) = दीप्त करते हैं । प्रभु ही इन सब लोक-लोकान्तरों को बनाते हैं, वे ही इन्हें प्रकाश प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का दर्शन देवों को होता है। ये देव सदा हवि का सेवन करते हैं । ये प्रभु ही सब लोकों को बनाते व प्रकाशित करते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवासः) मुमुक्षवः (यम्-अग्निम्-अजनयन्त) यं वैश्वानरमग्निं परमात्मानं स्वात्मनि प्रादुर्भावयन्ति (यस्मिन्) यदाश्रये (विश्वा भुवनानि) सर्वान् भावान् कामान् समर्पयन्ति (सः-अर्चिषा) स तेजसा (द्याम्-पृथिवीम्-उत-इमाम्) द्युलोकमन्तरिक्षम् “पृथिवी-अन्तरिक्षनाम” [निघ० १।३] अपि चेमां पृथिवीं च (महित्वा-ऋजूयमानः) समहत्त्वेन सरलगमनः सहजस्वभावस्तपति-प्रकाशयति ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni which all the divine powers of the universe create and serve, into which all worlds of the universe offer their oblations at the cosmic yajna of evolution and devolution, that Agni, radiant and natural ordainer, lights and energises this earth and heaven with its glory and self refulgence.