पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार उत्पन्न हुई हुई इस सुन्दर सृष्टि में देववृत्ति का पुरुष चाहता है कि (यज्ञियेभिः) = आदर के योग्य [ यज-पूजा] (देवेभिः) = ' मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव' उत्तम माता, पिता, आचार्य व अतिथि आदि देवों से (नु) = निश्चयपूर्वक (इषितः) = प्रेरणा को प्राप्त हुआ हुआ मैं (अग्निम्) = इस अग्रेणी प्रभु को (स्तोषाणि) = स्तुति करनेवाला बनूँ जो अग्नि (अजरम्) = कभी जीर्ण होनेवाला नहीं, (बृहन्तम्) = जो सदा वर्धमान है । [२] उस प्रभु का मैं स्तवन करूँ (यः) = जो (भानुना) = अपनी ज्ञानदीप्ति से, अपने तप से 'यस्य (ज्ञानमयं तपः पृथिवीम्) = इस विस्तृत अन्तरिक्षलोक को (द्याम्) = प्रकाशमय द्युलोक को (उत) = और (इमाम्) = इस पृथिवी को (आततान) = विस्तृत करते हैं । उस प्रभु का मैं स्तवन करूँ जो (रोदसी) = इन द्यावापृथिवी को तथा (अन्तरिक्षम्) = इनके बीच में स्थित इस अन्तरिक्षलोक को (भानुना) दीप्ति = से (आततान) = व्याप्त करता है। यहाँ अर्थ में 'भानुना' और 'आततान' शब्दों की पुनरावृत्ति करनी होती है। प्रभु इन लोकों को अपने तप व ज्ञान से बनाते हैं और इन्हें प्रकाश से परिपूर्ण कर देते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-देवताओं से उत्तम प्रेरणाओं को प्राप्त करते हुए हम सृष्टि निर्माता प्रभु के उपासक बनें।