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कत्य॒ग्नय॒: कति॒ सूर्या॑स॒: कत्यु॒षास॒: कत्यु॑ स्वि॒दाप॑: । नोप॒स्पिजं॑ वः पितरो वदामि पृ॒च्छामि॑ वः कवयो वि॒द्मने॒ कम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

katy agnayaḥ kati sūryāsaḥ katy uṣāsaḥ katy u svid āpaḥ | nopaspijaṁ vaḥ pitaro vadāmi pṛcchāmi vaḥ kavayo vidmane kam ||

पद पाठ

कति॑ । अ॒ग्नयः॑ । कति॑ । सूर्या॑सः । कति॑ । उ॒षसः॑ । कति॑ । ऊँ॒ इति॑ । स्वि॒त् । आपः॑ । न । उ॒प॒ऽस्पिज॑म् । वः॒ । पि॒त॒रः॒ । व॒दा॒मि॒ । पृ॒च्छामि॑ । वः॒ । क॒व॒यः॒ । वि॒द्मने॑ । कम् ॥ १०.८८.१८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:88» मन्त्र:18 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:13» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:18


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्नयः कति) अग्नियाँ कितनी ही हैं-बहुत हैं (सूर्याः कति) सूर्य कितने ही हैं-बहुत हैं (उषासः कति) उषाएँ कितनी ही हैं-बहुत हैं (आपः-उ कति स्वित्) जल कितने हैं (पितरः) हे पालक विद्वानों ! (नः) तुम्हें (उपस्पिजं न वदामि) उपालम्भरूप या स्वज्ञानप्रदर्शनार्थ नहीं पूछता हूँ, किन्तु (कवयः-वः-विद्मने कं पृच्छामि) विद्वानों ! आपसे ज्ञानप्राप्ति के लिये पूछता हूँ ॥१८॥
भावार्थभाषाः - अपने से बड़े विद्वानों से जिज्ञासापूर्वक पूछना चाहिए, अन्यथा स्वज्ञानप्रदर्शनार्थ नहीं, कि अग्नि या सूर्य जल कितने हैं ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सृष्टि विषयक प्रश्न

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में यज्ञ की प्रेरणा का उल्लेख था । उस यज्ञ के साथ सम्बद्ध अग्नि आदि के विषय में शिष्य आचार्य से प्रश्न करता है कि (कति अग्नयः) = अग्नियाँ कितनी हैं ? इसी प्रकार (सूर्यासः कति) = सूर्य कितने हैं ? क्या यही एक सूर्य है या इसी प्रकार अन्य भी सूर्य हैं ? (उषासः कति) = उषाकाल कितने हैं ? (उ) = और (आपः) = अन्तरिक्ष लोक व जल कितने हैं ? [२] ये सारे प्रश्न ब्रह्माण्ड की रचना से सम्बद्ध हैं। इन प्रश्नों का ठीक-ठीक उत्तर देना कठिन ही है। 'को अद्धावेद, क इह प्रवोचत्, कुत आजाता कुत इयं विसृष्टि: 'यह विविध सृष्टि कैसे हो गई ! कौन इसे साक्षात् जानता है और कौन इसका प्रतिपादन कर सकता है ? ये सब प्रश्न तो मनुष्य के ज्ञान से परे की चीजें हैं। सो विद्यार्थी कहता है कि हे (पितरः) = ज्ञान देनेवाले आचार्यो ! मैं (वः) = आपके प्रति (उपस्पिजम्) = स्पर्धायुक्त होकर (न वदामि) = इन प्रश्नों को नहीं कह रहा हूँ। मैं तो हे (कवयः) = क्रान्तदर्शी तत्त्वज्ञानी आचार्यो! विद्मने ज्ञान प्राप्ति के लिये ही (वः पृच्छामि) = आपसे इस प्रकार के प्रश्न कर रहा हूँ। जिससे इन प्रश्नों के तत्त्वज्ञान से (कम्) = सुख का विस्तार हो सके। [३] हमें परस्पर इसी प्रकार के प्रश्नोत्तरों से ज्ञान को बढ़ाकर जीवन को सुखी बनाना चाहिए। प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर इससे पूर्व ८ । ५८ । २ में इस प्रकार उपलब्ध होता है- 'एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विश्वमनु प्रभूतः । एकैवेषाः सर्वमिदं वियात्येकं वा इदं वि बभूव सर्वम्' । वस्तुतः एक ही अग्नि है जो नाना प्रकार से समिद्ध होती है। एक ही सूर्य है, जो सम्पूर्ण विश्व में प्रभाववाला हो रहा है । एक ही उषा इस सारे जगत् को दीप्त करती है। निश्चय से एक परमात्मा ही इस सब में व्याप्त हो रहा है। एक ही अग्नि स्थानभेद व कार्यभेद से मिलकर नामोंवाली हो जाती है। एक ही सूर्य महीनों के भेद से व सौर लोकों के भेद से भिन्न-भिन्न नामवाला होता है। उषा भी एक ही होती हुई भिन्न-भिन्न रूपों में प्रतीत होती है। [४] इस प्रकार के प्रश्नों को विद्यार्थी जिज्ञासा के भाव से करता है और ज्ञान प्राप्त करके प्रभु की महिमा के स्मरण से प्रभु के अधिक समीप होता हुआ अपने जीवन को पवित्र व आनन्दमय बना पाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अग्नि, सूर्य, उषा आदि का ज्ञान प्राप्त करके हम प्रभु के अधिक समीप प्राप्त हों । इस प्रकार अपने जीवनों को पवित्र व सुखी बना पायें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्नयः कति) अग्नयः कति सन्ति (सूर्याः कति) सूर्याः कति सन्ति (उषासः कति) उषसः कति सन्ति (आप उ कति स्वित्) आपोऽपि कति सन्ति (पितरः-वः-उपस्पिजं न वदामि) हे पालकाः ! युष्मान् उपालम्भनरूपं स्वज्ञानबलप्रदर्शनार्थं वा न वदामि (कवयः-वः-विद्मने पृच्छामि) हे विद्वांसो युष्मान् ज्ञानाय पृच्छामि ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - How many are the fires? How many the suns? How many the dawns? How many the waters? O enlightened sages, I say this not out of curiosity, I ask you this in all seriousness for the sake of knowledge.