'सूर्या' का 'सोम' के साथ विवाह
पदार्थान्वयभाषाः - [१] पत्नी को 'सूर्या' बनना चाहिए तो पति को 'सोम' बनने का प्रयत्न करना चाहिए । पति सोम का रक्षण करता हुआ सोमशक्ति का पुत्र हो, इस सोमशक्ति के रक्षण से वह सौम्य स्वभाव का भी हो। यह (सोमः) = सोमशक्ति का रक्षक सौम्य स्वभाव का युवक (वधूयुः अभवत्) = वधू की कामनावाला हुआ। जब यह वधू की कामनावाला हुआ तो (उभा अश्विना) = दोनों माता-पिता (वरा) = उसके साथी का चुनाव करनेवाले (आस्ताम्) = हुए। [२] सूर्या के माता-पिता युवक की तलाश में थे, सोम के माता-पिता भी योग्य युवति की खोज कर रहे थे। अग्नि ज्ञानी आचार्य ने उनका पथप्रदर्शन किया। उसके सुझाव पर (यत्) = जब (सूर्या यत्ये शंसन्तीम्) = पति का शंसन [इच्छा] करनेवाली हुई तब (सूर्याम्) = उस सूर्या को (सविता) = सूर्यतुल्य इसके पिता ने इसे (मनसा) = पूरे दिल से सोम के लिये अददात् दे दिया। इस प्रकार सूर्या का सोम के साथ विवाह सम्पन्न हो गया।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'युवक पत्नी की कामनावाला हो, युवति पति की कामनावाली' तो उनके माता पिता को उनके विवाह सम्बन्ध का आयोजन कर देना चाहिए ।