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स्तोमा॑ आसन्प्रति॒धय॑: कु॒रीरं॒ छन्द॑ ओप॒शः । सू॒र्याया॑ अ॒श्विना॑ व॒राग्निरा॑सीत्पुरोग॒वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

stomā āsan pratidhayaḥ kurīraṁ chanda opaśaḥ | sūryāyā aśvinā varāgnir āsīt purogavaḥ ||

पद पाठ

स्तोमाः॑ । आ॒स॒न् । प्र॒ति॒ऽधयः॑ । कु॒रीर॑म् । छन्दः॑ । ओ॒प॒शः । सू॒र्यायाः॑ । अ॒श्विना॑ । व॒रा । अ॒ग्निः । आ॒सी॒त् । पु॒रः॒ऽग॒वः ॥ १०.८५.८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:21» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:8


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्यायाः) कान्तिमती नववधू के (प्रतिधयः) प्रतिधारण करनेवाले सहयोगी (स्तोमाः) स्तोतव्य गुण (ओपशः) उपशयन करने योग्य-पलङ्ग (कुरीरं छन्दः) आचरण करने योग्य मनोभाव है (अश्विना वरा) जीवन में वरने के योग्य प्राण-अपान हैं (पुरोगवः-अग्निः-आसीत्) आगे प्रेरित करनेवाला परमात्मा या विवाहकाल की अग्नि है ॥८॥
भावार्थभाषाः - वधू के उत्तमगुण उसका साथ दिया करते हैं, आचरणीय मनोविचार उसको विश्राम देनेवाले हैं, प्राण-अपान दोनों जिसके ठीक-ठीक चलते हैं, वह सुरक्षित रहती है। परमात्मा को जो अपने सम्मुख आस्तिक भावना से रखती है या विवाहसम्बन्धी अग्नि को पति-पत्नीसम्बन्ध को प्रकाश में बनानेवाली आदर्श समझती है, उसका गृहस्थ सफल है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

साथी का ढूँढ़ना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (स्तोमाः) = प्रभु के स्तोत्र ही (प्रतिधयः) = [ प्रतिधि = food] भोजन (आसन्) = थे। जिस प्रकार अन्न का भोजन शरीर की पुष्टि का कारण बनता है, उसी प्रकार प्रभु के स्तोत्र इसकी अध्यात्म पुष्टि का कारण बनते हैं । (छन्दः) = वासनाओं से बचानेवाले [छद् अपवारणे] वेद-मन्त्र ही इसके (कुरीरम्) = शिरोवस्त्र व (ओपशः) = शिरोभूषण थे। इनके द्वारा ही उसके मस्तिष्क की शोभा थी । [२] इस (सूर्यायाः) = सूर्या के (अश्विना) = माता-पिता (वरा) = इसके साथी का वरण [चुनाव] करनेवाले थे। उन्होंने सूर्या के जीवनसंगी के ढूँढ़ने का काम प्रारम्भ किया। उनके इस कार्य में (अग्निः) = ज्ञानी ब्राह्मण ही (पुरोगवः) = इनका अगुआ, पथप्रदर्शक (आसीत्) = था । इनका कुलपुरोहित इनको इस कार्य में मदद करनेवाला हुआ । वस्तुतः इनके लड़कियों के आचार्य ही अग्नि हैं । वे इनके शिक्षक होने के कारण इनके गुण-कर्म-स्वभाव से परिचित होने से ठीक चुनाव कर पाते हैं। वे आचार्य परामर्श देते हैं। उस परामर्श के अनुसार माता-पिता देखभाल करते हैं और अन्त में सन्तानों की स्वीकृति होने पर ये सम्बन्ध परिपक्व हो जाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - स्तोत्र ही सूर्या के भोजन बने । वेद-मन्त्र 'शिरोवस्त्र व शिरोभूषण' हुए। अब माता-पिता ने ज्ञानी आचार्य की सहायता से इस सूर्या के जीवन-साथी को ढूँढना प्रारम्भ किया ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्यायाः प्रतिधयः स्तोमाः-आसन्) तस्या नववध्वाः प्रतिधारकाः सहयोगिनः स्तोतव्या गुणाः सन्ति (ओपशः कुरीरं छन्दः) आ-उपशः-समन्तादुपशयनपर्यङ्कः करणीयमाचरणीयं मनोवृत्तम् “कृञ उच्च ईरन्” [उणा० ४।३३] (अश्विना वरा) जीवने वरयितव्यौ मातापितराविव प्राणापानौ स्तः “अश्विनौ प्राणापानौ” [यजु० २१।६० दयानन्दः] (पुरोगवः-अग्निः-आसीत्) पुरोगन्ता परमात्मा यद्वा वैवाहिकोऽग्निरस्ति ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Hymns of adoration are the axle of her chariot wheels, music of the hymns, her head scarf and cushion, the Ashvins, prana and udana energies, are friends of the groom, and Agni is the first call of maturity.